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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.20.81 
सनातन कहे, - “आमि माधुकरी करिब ।
ब्राह्मणेर घरे केने एकत्र भिक्षा लब ?” ॥81॥
 
 
अनुवाद
सनातन ने उत्तर दिया, "मैं मधुकरी का अभ्यास करूँगा। मैं ब्राह्मण के घर में पूर्ण भोजन क्यों ग्रहण करूँ?"
 
Sanatana replied, "I will follow the Madhukari method. Why should I accept a full meal at a Brahmin's house?"
तात्पर्य
'माधुकरी' शब्द 'माधुकर' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है शहद को फूल से फूल पर इकट्ठा करने वाली मधुमक्खियाँ। एक 'माधुकरी' एक संत या भिक्षु होता है जो एक घर में पूरा भोजन ग्रहण नहीं करता है, लेकिन घर-घर जाकर भिक्षा माँगता है, प्रत्येक गृहस्थ के घर से थोड़ा भोजन लेता है। इस तरह वह अधिक भोजन नहीं करता है या गृहस्थों को अनावश्यक परेशानी नहीं देता है। त्याग किए हुए आश्रम में रहने वाला व्यक्ति भिक्षा माँग सकता है, लेकिन खाना नहीं बना सकता है। उसकी भिक्षा गृहस्थों के लिए बोझ नहीं होनी चाहिए। 'माधुकरी' प्रक्रिया का पालन एक 'बाबाजी' को सख्ती से करना चाहिए, अर्थात वह जो 'परमहंस' अवस्था को प्राप्त कर लिया है। यह प्रथा अभी भी वृंदावन में प्रचलित है, और ऐसे कई स्थान हैं जहाँ भिक्षा दी जाती है। दुर्भाग्य से, ऐसे कई भिखारी हैं जो 'माधुकरी' के सिद्धांतों का पालन नहीं करते हुए भिक्षा स्वीकार करने वृंदावन आए हैं। लोग उसका अनुकरण करने की कोशिश करते हैं और 'माधुकरी' का अभ्यास करके एक आलसी जीवन जीते हैं। सनातन गोस्वामी या रूप गोस्वामी का सख्ती से पालन करना लगभग असंभव है। मंदिर में कृष्ण को भेंट किए गए भोजन को स्वीकार करना सनातन गोस्वामी और रूप गोस्वामी की नकल करने की कोशिश करने से बेहतर है।

यूक्ताहार-विहारस्य युक्त-चेष्टस्य कर्मसु |

युक्त-स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःख-हा ||

"भोजन, नींद, मनोरंजन और काम की अपनी आदतों में विनियमित होने वाला व्यक्ति योग प्रणाली का अभ्यास करके सभी भौतिक कष्टों को कम कर सकता है।" (भगवद् गीता 6.17)

आदर्श संन्यासी गोस्वामियों द्वारा प्रचलित मार्ग का सख्ती से पालन करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)