श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.20.61 
अक्ष्णोः फलं त्वादृश - दर्शनं हि तनोः फलं त्वादृश - गात्र - सङ्गः ।
जिह्वा - फलं त्वादृश - कीर्तनं हि सु - दुर्लभा भागवता हि लोके ॥61॥
 
 
अनुवाद
“‘मेरे प्रिय वैष्णव, आपके जैसे व्यक्ति को देखना ही दृष्टि की पूर्णता है, आपके चरण कमलों को छूना ही स्पर्श की पूर्णता है, और आपके अच्छे गुणों का गुणगान करना ही जीभ का वास्तविक कार्य है, क्योंकि भौतिक संसार में भगवान का शुद्ध भक्त मिलना बहुत कठिन है।’”
 
"O Vaishnava, to see a person like you is the perfection of sight. To touch your lotus feet is the perfection of the sense of touch. To sing of your virtues is the true function of the tongue, for it is extremely difficult to find a pure devotee of the Lord in the material world."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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