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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.20.6 
एक बन्दी छाड़े यदि निज - धर्म देखिया ।
संसार हइते तारे मुक्त करेन गोसाञा ॥6॥
 
 
अनुवाद
“यदि कोई व्यक्ति धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार किसी बद्धजीव या बंदी व्यक्ति को मुक्त करता है, तो वह स्वयं भी भगवान द्वारा भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है।”
 
“If a person frees a conditioned soul or a captive person according to religious rules, then the Lord also frees him from material bondage.”
तात्पर्य
इस कथन से प्रतीत होता है कि सनातन गोस्वामी, जो पहले नवाब के मंत्री थे, मुस्लिम अधीक्षक को धोखा देने का प्रयास कर रहे थे। एक जेल अधीक्षक के पास केवल एक साधारण शिक्षा या व्यावहारिक रूप से कोई शिक्षा नहीं होती है, और निश्चित रूप से वह आध्यात्मिक ज्ञान में बहुत उन्नत नहीं होना चाहिए था। लेकिन बस उसे संतुष्ट करने के लिए, सनातन गोस्वामी ने उसकी प्रशंसा एक महान विद्वान के रूप में की। जेलर इस बात से इनकार नहीं कर सकता था कि वह एक विद्वान व्यक्ति था, क्योंकि जब किसी को एक ऊँचे स्थान पर पहुँचाया जाता है, तो व्यक्ति खुद को उस पद के लायक समझता है। सनातन गोस्वामी आध्यात्मिक गतिविधि के प्रभावों को सही तरीके से समझा रहे थे, और जेलर ने अपने कथन को अपनी जेल से रिहाई से जोड़ दिया।

माया के जादू के प्रभाव से संतुष्टि में, भौतिक दुनिया में अनगिनत बंधी हुई आत्माएं सड़ रही हैं। जीव माया के जादू से इतना मुग्ध है कि बंधी हुई ज़िंदगी में एक सूअर भी संतुष्ट होता है। माया द्वारा प्रदर्शित दो प्रकार की शक्तियाँ हैं। एक को प्रक्षेपात्मा कहा जाता है तो दूसरे को आवरणात्मक कहा जाता है। जब कोई भौतिक बंधन से बाहर निकलने के लिए दृढ़ होता है तो प्रक्षेपात्मा-शक्ति, मोड़ की शक्ति, उसे संतुष्टि में बंधी हुई ज़िन्दगी में रहने के लिए प्रेरित करती है। दूसरी शक्ति (आवरणात्मक) के कारण, एक बंधी हुई आत्मा संतुष्ट होती है, यहाँ तक ​​कि अगर वह एक सूअर के शरीर में या मल में कीड़े के रूप में सड़ रही हो। एक बंधी हुई आत्मा को भौतिक बंधन से मुक्त करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि माया का जादू बहुत मजबूत है। यहाँ तक ​​कि जब स्वयं भगवान खुद बंधी हुई आत्माओं को उद्धार करने के लिए उतरते हैं, उनसे अपने आप को समर्पित करने के लिए कहते हैं, फिर भी बंधी हुई आत्माएँ भगवान के प्रस्ताव से सहमत नहीं होती हैं। इसलिए श्री सनातन गोस्वामी ने कहा, "किसी तरह, अगर कोई किसी दूसरे को माया के बंधन से मुक्त करने में मदद करता है, तो उसे निश्चित रूप से भगवान द्वारा तुरंत पहचाना जाता है।" जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (18.69) में कहा है।

भगवान की सबसे बड़ी सेवा जो कोई भी कर सकता है वह है बंधी हुई आत्मा के हृदय में भक्ति सेवा का संचार करने की कोशिश करना ताकि बंधी हुई आत्मा को बंधी हुई ज़िंदगी से मुक्त किया जा सके। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है कि वैष्णव को उसके प्रचार कार्य से पहचाना जाता है - यानी, बंधी हुई आत्मा को उसकी शाश्वत स्थिति के बारे में विश्वास दिलाना, जिसे यहाँ निज-धर्म के रूप में समझाया गया है। भगवान की सेवा करना जीवित प्राणी की शाश्वत स्थिति है; इसलिए किसी को भौतिक बंधन से मुक्ति दिलाने में मदद करना इस सोई हुई समझ को जगाना है कि वह कृष्ण का शाश्वत सेवक है। जीवरा 'स्वरूप' है - कृष्णरा 'नित्य-दास'। भगवान स्वयं सनातन गोस्वामी को आगे बताएँगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)