माया के जादू के प्रभाव से संतुष्टि में, भौतिक दुनिया में अनगिनत बंधी हुई आत्माएं सड़ रही हैं। जीव माया के जादू से इतना मुग्ध है कि बंधी हुई ज़िंदगी में एक सूअर भी संतुष्ट होता है। माया द्वारा प्रदर्शित दो प्रकार की शक्तियाँ हैं। एक को प्रक्षेपात्मा कहा जाता है तो दूसरे को आवरणात्मक कहा जाता है। जब कोई भौतिक बंधन से बाहर निकलने के लिए दृढ़ होता है तो प्रक्षेपात्मा-शक्ति, मोड़ की शक्ति, उसे संतुष्टि में बंधी हुई ज़िन्दगी में रहने के लिए प्रेरित करती है। दूसरी शक्ति (आवरणात्मक) के कारण, एक बंधी हुई आत्मा संतुष्ट होती है, यहाँ तक कि अगर वह एक सूअर के शरीर में या मल में कीड़े के रूप में सड़ रही हो। एक बंधी हुई आत्मा को भौतिक बंधन से मुक्त करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि माया का जादू बहुत मजबूत है। यहाँ तक कि जब स्वयं भगवान खुद बंधी हुई आत्माओं को उद्धार करने के लिए उतरते हैं, उनसे अपने आप को समर्पित करने के लिए कहते हैं, फिर भी बंधी हुई आत्माएँ भगवान के प्रस्ताव से सहमत नहीं होती हैं। इसलिए श्री सनातन गोस्वामी ने कहा, "किसी तरह, अगर कोई किसी दूसरे को माया के बंधन से मुक्त करने में मदद करता है, तो उसे निश्चित रूप से भगवान द्वारा तुरंत पहचाना जाता है।" जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (18.69) में कहा है।
भगवान की सबसे बड़ी सेवा जो कोई भी कर सकता है वह है बंधी हुई आत्मा के हृदय में भक्ति सेवा का संचार करने की कोशिश करना ताकि बंधी हुई आत्मा को बंधी हुई ज़िंदगी से मुक्त किया जा सके। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है कि वैष्णव को उसके प्रचार कार्य से पहचाना जाता है - यानी, बंधी हुई आत्मा को उसकी शाश्वत स्थिति के बारे में विश्वास दिलाना, जिसे यहाँ निज-धर्म के रूप में समझाया गया है। भगवान की सेवा करना जीवित प्राणी की शाश्वत स्थिति है; इसलिए किसी को भौतिक बंधन से मुक्ति दिलाने में मदद करना इस सोई हुई समझ को जगाना है कि वह कृष्ण का शाश्वत सेवक है। जीवरा 'स्वरूप' है - कृष्णरा 'नित्य-दास'। भगवान स्वयं सनातन गोस्वामी को आगे बताएँगे।
