श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 397
 
 
श्लोक  2.20.397 
अतएव गोलोक - स्थाने नित्य विहार ।
ब्रह्माण्ड - गणे क्रमे प्राकट्य ताहार ॥397॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की शाश्वत लीलाएँ मूल गोलोक वृन्दावन में निरंतर घटित हो रही हैं। यही लीलाएँ भौतिक जगत में, प्रत्येक ब्रह्माण्ड में, क्रमशः प्रकट होती रहती हैं।"
 
"Krishna's eternal pastimes continue uninterrupted in the original planet of Goloka, Vrindavan. These same pastimes unfold sequentially in each universe in the physical world."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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