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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 384
 
 
श्लोक  2.20.384 
क्रमे बाल्य - पौगण्ड - कैशोरता - प्राप्ति ।
रास - आदि लीला करे, कैशोरे नित्य - स्थिति ॥384॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण अपनी बाल्यावस्था, बाल्यावस्था और पूर्व-यौवन की लीलाएँ प्रदर्शित करते हैं। जब वे पूर्व-यौवन में पहुँचते हैं, तो वे रास नृत्य और अन्य लीलाएँ करने के लिए अनंत काल तक विद्यमान रहते हैं।"
 
"Lord Krishna manifests his pastimes in childhood, adolescence, and adolescence. When he attains adolescence, he exists eternally to perform his Rasa dance and other pastimes."
तात्पर्य
यहाँ की तुलना बहुत ही रोचक है। कृष्ण सामान्य मानव की तरह नहीं बढ़ते हैं, भले ही वे बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था के अपने लीलाओं का प्रदर्शन करते हों। जब वे युवावस्था यानी किशोरावस्था की आयु तक पहुँचते हैं, तो वे उससे अधिक नहीं होते हैं। वे केवल अपनी किशोरावस्था में ही रहते हैं। इसलिए उन्हें ब्रह्म-संहिता (5.33) में नव-यौवन के रूप में वर्णित किया गया है:

अद्वैतं अच्युतम् अनादिम् अनन्त-रूपं

 आद्यं पुराण-पुरुषं नव-यौवनं च

वेदेशु दुर्लभम् अदुर्लभम् आत्म-भक्तौ

 गोविन्दम् आदि-पुरुषं तम अहं भजामि

यह नव-यौवन, याकिशोरावस्था, कृष्ण का अनादि और अलौकिक रूप है। कृष्ण कभी भी नव-यौवन से अधिक उम्र के नहीं होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)