श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 376
 
 
श्लोक  2.20.376 
अथ वा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥376॥
 
 
अनुवाद
"लेकिन हे अर्जुन, इस विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है? मैं अपने एक अंश मात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ और उसे धारण करता हूँ।"
 
"But what is the need for all this vast knowledge, O Arjuna? With just a part of myself, I pervade and support this entire universe."
तात्पर्य
यह एक कथन श्रीकृष्ण का भी है, जो भगवद गीता (10.42) में आता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)