Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 347
 
 
श्लोक  2.20.347 
कलि सभाजयन्त्यार्या गुण - ज्ञाः सार - भागिनः ।
यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्व - स्वार्थोऽभिलभ्यते ॥347॥
 
 
अनुवाद
"जो लोग उन्नत और उच्च योग्यता वाले हैं और जीवन के सार में रुचि रखते हैं, वे कलियुग के गुणों को जानते हैं। ऐसे लोग कलियुग की पूजा करते हैं क्योंकि इस युग में केवल हरे कृष्ण महामंत्र के जाप से आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति की जा सकती है और जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।"
 
"Those who are advanced and highly qualified and interested in the essence of life understand the virtues of Kaliyuga. Such people worship Kaliyuga, because in this age, simply by chanting the Hare Krishna mantra, one can progress in self-knowledge and achieve the goal of life."
तात्पर्य
यह श्रीमद्भागवतम (11.5.36) का उद्धरण है, जो नौ योगेन्द्रों में से एक महान ऋषि कबंधन ऋषि द्वारा कहा गया था। ऋषि महाराजा निमि को विभिन्न युगों में अलग-अलग प्रक्रियाओं के अनुसार भगवान की सर्वोच्च विभूति की पूजा करने के लोगों के कर्तव्य के बारे में बता रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)