क्लेशो ऽधिकतरस तेषाँ व्यक्तासक्ता-चेतसाम्
अव्यक्ता हि गतिर् दु:खम् देहवद्भिरवाप्यते
"जिनके चित्त सर्वोच्च के अव्यक्त, अवैयक्तिक स्वरूप से जुड़े हुए हैं, उनकी उन्नति बहुत कष्टप्रद है। उस अनुशासन में प्रगति करना हमेशा उन लोगों के लिए कठिन होता है जो देहधारी हैं।" ध्यान कैसे करना है, यह न जानते हुए, मूर्ख लोग केवल कष्ट भोगते हैं, और उनकी आध्यात्मिक गतिविधियों से कोई लाभ नहीं मिलता है।
श्रीमद्-भागवत के इस श्लोक में व्यक्त एक ही विचार विष्णु पुराण (6.2.17), पद्म पुराण (उत्तर-खंड 72.25) और बृहन्नारदीय पुराण (38.97) के निम्नलिखित श्लोक में भी पाया जा सकता है।
