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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 345
 
 
श्लोक  2.20.345 
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरि - कीर्तनात् ॥345॥
 
 
अनुवाद
'जो फल सत्ययुग में भगवान विष्णु का ध्यान करने से, त्रेतायुग में यज्ञ करने से तथा द्वापर में भगवान के चरणकमलों की सेवा करने से प्राप्त होता था, वही फल कलियुग में केवल हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने से प्राप्त किया जा सकता है।'
 
“The fruits obtained by meditating on Vishnu in Satyayuga, by performing sacrifices in Tretayuga, and by serving the Lord's feet in Dvaparayuga, can be obtained in Kaliyuga only by chanting the Hare Krishna Mahamantra.”
तात्पर्य
यह श्लोक श्रीमद्-भागवत (12.3.52) से उद्धृत है। कलि-युग के वर्तमान समय में ऐसे कई झूठे ध्यानकर्ता हैं जो कुछ काल्पनिक रूपों की कल्पना करते हैं और उन पर ध्यान करने का प्रयास करते हैं। ध्यान फैशनेबल हो गया है, परन्तु लोगों को ध्यान के उद्देश्य के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। यह यहाँ समझाया गया है। यद् ध्यायतो विष्णुम्। व्यक्ति को भगवान विष्णु या भगवान कृष्ण पर ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों का उल्लेख किये बिना, तथाकथित ध्यानकर्ता अवैयक्तिक वस्तुओं का लक्ष्य बनाते हैं। भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (12.5) में उनकी भर्त्सना की है:

क्लेशो ऽधिकतरस तेषाँ व्यक्तासक्ता-चेतसाम्

अव्यक्ता हि गतिर् दु:खम् देहवद्भिरवाप्यते

"जिनके चित्त सर्वोच्च के अव्यक्त, अवैयक्तिक स्वरूप से जुड़े हुए हैं, उनकी उन्नति बहुत कष्टप्रद है। उस अनुशासन में प्रगति करना हमेशा उन लोगों के लिए कठिन होता है जो देहधारी हैं।" ध्यान कैसे करना है, यह न जानते हुए, मूर्ख लोग केवल कष्ट भोगते हैं, और उनकी आध्यात्मिक गतिविधियों से कोई लाभ नहीं मिलता है।

श्रीमद्-भागवत के इस श्लोक में व्यक्त एक ही विचार विष्णु पुराण (6.2.17), पद्म पुराण (उत्तर-खंड 72.25) और बृहन्नारदीय पुराण (38.97) के निम्नलिखित श्लोक में भी पाया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)