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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 337
 
 
श्लोक  2.20.337 
द्वापरे भगवान्श्यामः पीत - वासा निजायुधः ।
श्री - वत्सादिभिरकैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥337॥
 
 
अनुवाद
"द्वापरयुग में भगवान कृष्णमय वर्ण में प्रकट होते हैं। वे पीले वस्त्र धारण करते हैं, अपने ही आयुध धारण करते हैं, कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स चिह्न से सुशोभित होते हैं। उनके लक्षणों का वर्णन इसी प्रकार किया गया है।"
 
"In the Dvapara Yuga, the Lord appears with a dark complexion. He wears yellow robes. He carries his weapons and is adorned with the Kaustubha gem and the Srivatsa symbol. His characteristics are described as follows."
तात्पर्य
यह श्रीमद् भागवतम (11.5.27) का एक उद्धरण है। श्याम रंग ठीक-ठीक काला नहीं है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इसकी तुलना अतासी फूल के रंग से करते हैं। ऐसा नहीं है कि भगवान कृष्ण स्वयं सभी द्वापर युगों में काले रंग में प्रकट होते हैं। भगवान कृष्ण के प्रकट होने से पहले के अन्य द्वापर युगों में, परम भगवान अपने स्वीय विस्तार से हरित शरीर में प्रकट हुए थे। इसका उल्लेख विष्णु पुराण, हरिवंश और महाभारत में किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)