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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 308
 
 
श्लोक  2.20.308 
माया - सङ्ग - विकारी रुद्रभिन्नाभिन्न रूप ।
जीव - तत्त्व नहे, नहे कृष्णेर ‘स्वरूप’ ॥308॥
 
 
अनुवाद
"रुद्र, भगवान शिव, के विभिन्न रूप हैं, जो माया के साथ संगति द्वारा उत्पन्न परिवर्तन हैं। यद्यपि रुद्र जीव-तत्त्व के स्तर पर नहीं हैं, फिर भी उन्हें भगवान कृष्ण का व्यक्तिगत विस्तार नहीं माना जा सकता।
 
"Rudra is the various forms of Shiva, which are transformations resulting from the association with Maya. Although Rudra is not a living entity, he cannot be considered a part of Krishna.
तात्पर्य
रुद्र विष्णु-तत्व से एक और अलग भी हैं। माया से उनके संबंध के कारण, वे विष्णु-तत्व से भिन्न हैं, लेकिन साथ ही वे कृष्ण के व्यक्तिगत रूप का विस्तार भी हैं। इस स्थिति को भेदाभेद-तत्व या अचिंत्य-भेदाभेद-तत्व कहा जाता है, जो एक साथ एक और अलग है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)