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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.20.3 
एथा गौड़े सनातन आछे बन्दि - शाले ।
श्री - रूप - गोसाजीर पत्री आइल हेन - काले ॥3॥
 
 
अनुवाद
जब सनातन गोस्वामी बंगाल में कैद थे, तब श्रील रूप गोस्वामी का एक पत्र आया।
 
When Sanatana Goswami was imprisoned in Bengal, he received a letter from Srila Rupa Goswami.
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर हमें सूचित करते हैं कि इस पत्र को रूप गोस्वामी ने सनातन गोस्वामी को यमुना के किनारे बकल में लिखा था। इसमें लिखा था कि श्री चैतन्य महाप्रभु मथुरा आ रहे हैं, और कहा गया है:

यदु-पतेः क्व गता मथुरा-पुरी

रघु-पतेः क्व गतोत्तरा-कोशला

इति विचिन्त्य कुरुष्व मनः स्थिरम्

न सद् इदं जगद इति अवधारय

"यदुपति की मथुरा-पुरी कहाँ गई? रघुपति की उत्तर कोशल कहाँ गई? विचार करके मन को स्थिर करो, यह सोचते हुए कि 'यह जगत शाश्वत नहीं है।' "

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)