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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  2.20.276 
तबे महत्तत्त्व हैते त्रिविध अहङ्कार ।
याहा हैते देवतेन्द्रिय - भूतेर प्रचार ॥276॥
 
 
अनुवाद
“सबसे पहले समग्र भौतिक ऊर्जा प्रकट होती है, और इससे तीन प्रकार के अहंकार उत्पन्न होते हैं, जो मूल स्रोत हैं जिनसे सभी देवता [नियंत्रण करने वाले देवता], इंद्रियां और भौतिक तत्व विस्तारित होते हैं।
 
“First of all, the total material energy (mahat tattva) manifests, from which the three types of egos emerge, and this is the original source from which all the deities (controlling deities), senses and material elements emanate.
तात्पर्य
अहंकार के तीन प्रकार (अहङ्कार) तकनीकी रूप से वैकारिक, तैजस और तामस के रूप में जाने जाते हैं। महत-तत्त्व हृदय या चित्त में स्थित है, और महत-तत्त्व का प्रधान देव भगवान वासुदेव है (भाग. 3.26.21)। महत-तत्त्व को तीन रूपों में रूपांतरित किया जाता है: (१) वैकारिक, सत्त्व में अहंकार (सात्त्विक-अहंकार), जिससे ग्यारहवां इंद्रिय अंग, मन प्रकट होता है, जिसका प्रधान देव अनिरुद्ध है (भाग. 3.26.27-28); (२) तैजस, या रजोगुण में अहंकार (राजस-अहंकार), जिससे मन, बुद्धि के साथ-साथ सक्रिय और ज्ञान-प्राप्त करने वाली इंद्रियों का प्रकटीकरण होता है, जिसका प्रधान देव भगवान प्रद्युम्न है (भाग. 3.26.29-31); और (३) तामस, या अज्ञान में अहंकार, जिससे ध्वनि कंपन (शब्द-तन्मात्र) का विस्तार होता है। ध्वनि कंपन से, आकाश (आकाश) प्रकट होता है, और फिर सुनने की इंद्रिय से शुरू होने वाली इंद्रियों का भी प्रकटीकरण होता है (भाग। 3.26.32)। अहंकार के इन तीन प्रकारों में से, भगवान संकर्षण प्रधान देव हैं। सांख्य-कारिका के नाम से जाने जाने वाले दार्शनिक प्रवचन में कहा गया है, सात्त्विक एकादशकः प्रवर्तते वैकृताद अहंकारात - भूतादेस तन्मात्रं तामस तैजसाध्यूभयम्।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)