सर्व-योनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः
तासां ब्रह्म महद् योनिः अहं बीज-प्रदः पिता
"यह समझना चाहिए कि जीवित प्राणियों की सभी प्रजातियों का जन्म इस भौतिक प्रकृति में संभव है, और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।"
एक विस्तृत विवरण के लिए, कोई ब्रह्म-संहिता (अध्याय पाँच, श्लोक 10-13) को संदर्भित कर सकता है। ब्रह्म-संहिता (5.51) में यह भी कहा गया है:
अग्नि महि गगन अम्बु मरुद दिशाश च
काल तथैवात्म-मनसीति जगत्-त्रयाणि
यस्माद्भवन्ति विभवंति विशन्ति यं च
गोविंदमादि-पुरुषं तमहं भजामि
सभी भौतिक तत्वों, साथ ही आध्यात्मिक चिंगारियों (व्यक्तिगत आत्माओं) का उत्सर्जन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से हो रहा है। इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (1.1) से होती है: जनमाद्य अस्य यतः। "परम सत्य वही है जिससे सब कुछ निकलता है।" वह परम सत्य है: सत्यं परं धीमहि (भागवत। 1.1.1)। परम अंतिम सत्य कृष्ण है। ओं नमो भगवते वासुदेवाय/ जनमाद्य अस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्व-राट: "परम सत्य वह व्यक्ति है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को जानता है।" (भागवत। 1.1.1)
परम सत्य, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, ने भगवान ब्रह्मा को हृदय से शिक्षित किया (भागवत। 1.1.1): तेन ब्रह्म हृदा य आदिक-कवे। इसलिए परम सत्य मृत पदार्थ नहीं हो सकता; परम सत्य स्वयं सर्वोच्च व्यक्ति ही होना चाहिए। सेई पुरुष माया-पाने करे अवधान। केवल उसकी नज़र से, भौतिक प्रकृति सभी जीवित संस्थाओं से प्रभावित होती है। उनके कर्म और फलदायी गतिविधि के अनुसार, वे विभिन्न निकायों में उभरते हैं। भगवद्-गीता (2.13) द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण यह है:
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा
तथा देहान्तर-प्राप्तिर् धीरस्तत्र न मुह्यति
"जैसे मूर्त आत्मा लगातार इस शरीर में बचपन से युवावस्था से बुढ़ापे तक जाती है, वैसे ही आत्मा भी मृत्यु के समय दूसरे शरीर में चली जाती है। एक समझदार व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से भ्रमित नहीं होता है।"
