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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 272
 
 
श्लोक  2.20.272 
सेइ पुरुष माया - पाने करे अवधान ।
प्रकृति क्षोभित करि’ करे वीर्येर आधान ॥272॥
 
 
अनुवाद
"जब भगवान भौतिक शक्ति पर दृष्टि डालते हैं, तो वह उत्तेजित हो जाती है। उस समय, भगवान जीवों के मूल वीर्य का संचार करते हैं।
 
"When the Supreme Personality of Godhead looks upon material energy, it becomes agitated. At that time, the Lord enters it with His original semen in the form of the living entity.
तात्पर्य
भगवत्-गीता (7.10) में कृष्ण कहते हैं, बीजं माम सर्व-भूतानाम्: "मैं सभी अस्तित्वों का मूल बीज हूँ।" भगवद्-गीता (14.4) के एक अन्य श्लोक में भी इसकी पुष्टि की गई है:

सर्व-योनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः

तासां ब्रह्म महद् योनिः अहं बीज-प्रदः पिता

"यह समझना चाहिए कि जीवित प्राणियों की सभी प्रजातियों का जन्म इस भौतिक प्रकृति में संभव है, और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।"

एक विस्तृत विवरण के लिए, कोई ब्रह्म-संहिता (अध्याय पाँच, श्लोक 10-13) को संदर्भित कर सकता है। ब्रह्म-संहिता (5.51) में यह भी कहा गया है:

अग्नि महि गगन अम्बु मरुद दिशाश च

काल तथैवात्म-मनसीति जगत्-त्रयाणि

यस्माद्भवन्ति विभवंति विशन्ति यं च

गोविंदमादि-पुरुषं तमहं भजामि

सभी भौतिक तत्वों, साथ ही आध्यात्मिक चिंगारियों (व्यक्तिगत आत्माओं) का उत्सर्जन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से हो रहा है। इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (1.1) से होती है: जनमाद्य अस्य यतः। "परम सत्य वही है जिससे सब कुछ निकलता है।" वह परम सत्य है: सत्यं परं धीमहि (भागवत। 1.1.1)। परम अंतिम सत्य कृष्ण है। ओं नमो भगवते वासुदेवाय/ जनमाद्य अस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्व-राट: "परम सत्य वह व्यक्ति है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को जानता है।" (भागवत। 1.1.1)

परम सत्य, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, ने भगवान ब्रह्मा को हृदय से शिक्षित किया (भागवत। 1.1.1): तेन ब्रह्म हृदा य आदिक-कवे। इसलिए परम सत्य मृत पदार्थ नहीं हो सकता; परम सत्य स्वयं सर्वोच्च व्यक्ति ही होना चाहिए। सेई पुरुष माया-पाने करे अवधान। केवल उसकी नज़र से, भौतिक प्रकृति सभी जीवित संस्थाओं से प्रभावित होती है। उनके कर्म और फलदायी गतिविधि के अनुसार, वे विभिन्न निकायों में उभरते हैं। भगवद्-गीता (2.13) द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण यह है:

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा

तथा देहान्तर-प्राप्तिर् धीरस्तत्र न मुह्यति

"जैसे मूर्त आत्मा लगातार इस शरीर में बचपन से युवावस्था से बुढ़ापे तक जाती है, वैसे ही आत्मा भी मृत्यु के समय दूसरे शरीर में चली जाती है। एक समझदार व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से भ्रमित नहीं होता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)