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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 270
 
 
श्लोक  2.20.270 
न यत्र माया किमुतापरे हरेर् ।
अनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥270॥
 
 
अनुवाद
"आध्यात्मिक जगत में न तो रजोगुण है, न तमोगुण, न दोनों का मिश्रण, न ही मिलावटी सत्व, न काल का प्रभाव, न ही स्वयं माया। केवल भगवान के शुद्ध भक्त, जिनकी पूजा देवता और असुर दोनों करते हैं, ही आध्यात्मिक जगत में भगवान के पार्षद के रूप में निवास करते हैं।"
 
"In the spiritual world, there is neither passion nor ignorance, nor any mixture of the two. Nor is there mixed sattva, nor the influence of time or maya itself. Here, only the pure devotees of the Lord live as companions of the Lord, worshipped by both gods and demons."
तात्पर्य
श्रीमद भागवत (2.9.10) का यह श्लोक श्रील शुकदेव गोस्वामी द्वारा बोला गया था। वह परीक्षित महाराज के प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे, जिन्होंने पूछा कि जीव भौतिक संसार में कैसे गिरता है। शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद भागवत का सार चार छंदों में समझाया, जो एक हजार दिव्य वर्षों तक कठिन तपस्या करने के बाद भगवान ब्रह्मा को समझाए गए थे। उस समय, ब्रह्मा को आध्यात्मिक दुनिया और उसकी पारलौकिक प्रकृति दिखाई गई थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)