श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  2.20.258 
सहस्र - पत्रं कमलं गोकुलाख्यं महत्पदम् ।
तत्कर्णिकारं तद्घाम तदनन्तांश - सम्भवम् ॥258॥
 
 
अनुवाद
"गोकुल, परम धाम और लोक, सहस्रदल कमल के समान प्रतीत होता है। उस कमल का चक्र परम भगवान कृष्ण का धाम है। यह कमलाकार परम धाम भगवान अनंत की इच्छा से निर्मित है।"
 
"The Supreme Abode and Realm of Gokul resembles a thousand-petaled lotus flower. The center of this lotus is the abode of Lord Krishna. This lotus-shaped Supreme Abode is born by the will of Lord Ananta."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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