अवजानन्ति मां मूढा: मानुषीं तनुम् आश्रितम
परम भावम अजानन्तो, मम भूत-महेश्वरम
"जब मैं मानवीय रूप में अवतरित होता हूं, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मेरे अलौकिक स्वरूप को सर्वोच्च प्रभु के रूप में नहीं जानते हैं।"
अवतार अपनी स्वतंत्र इच्छा से अवतरित होते हैं, और हालाँकि वे सामान्य मानवीय प्राणियों की तरह काम कर सकते हैं, लेकिन वे इस भौतिक दुनिया के नहीं हैं। भगवान कृष्ण और उनके अवतारों को केवल भगवान की कृपा से ही समझा जा सकता है।
न अय आत्मा प्रवचनेन लभ्य:
न मेधया न बहुन श्रुतेन
यम एवैष वृणुते तेन लभ्य:
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वम्
(कठ उपनिषद 1.2.23)
"परमेश्वर विद्वानों के व्याख्यान, विशाल बुद्धि या बहुत अधिक सुनने से प्राप्त नहीं होते हैं। वह केवल उसी को प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं चुनता है। ऐसे व्यक्ति को, वह स्वयं अपने रूप को प्रकट करता है।"
अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-
प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि
जानति तत्त्वं भगवन-महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्
(भा.ग. 10.14.29)
"हे प्रभु, यदि कोई आपके कमल चरणों की दया के एक छोटे से अंश से भी अनुगृहीत होगा, तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। लेकिन जो लोग ईश्वर को समझने के लिए अनुमान लगाते हैं, वे आपको नहीं जान पाते, चाहे वे कई सालों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।"
