आर्च्ये विष्णौ शिला-धीर् गुरुषु नर-मतिर् वैष्णवे जाती-बुद्धिः
विष्णोर वा वैष्णवानां कलि-मल-मथने पाघ-तीर्थे ’म्बु-बुद्धिः
श्री-विष्णोर नामनी मंत्रे सकल-कलुष-हे शब्द-सामान्य-बुद्धिः
विष्णौ सर्वेश्वरेषे तदितर-सम-धीर् यस्य वा नारकी सः
किसी को भी मंदिर में देवता को पत्थर या लकड़ी से बना हुआ नहीं मानना चाहिए, और न ही किसी को आध्यात्मिक गुरु को एक सामान्य मनुष्य मानना चाहिए। किसी को वैष्णव को एक विशेष जाति या संप्रदाय का नहीं मानना चाहिए, और किसी को चरणामृत या गंगा के पानी को सामान्य पानी जैसा नहीं मानना चाहिए। और न ही किसी को हरे कृष्ण महा-मंत्र को भौतिक कंपन मानना चाहिए। भौतिक जगत में कृष्ण के ये सभी विस्तार केवल भगवान की दया और अपने भक्तों को सुविधा देने की इच्छा का प्रदर्शन है जो भौतिक जगत में उनकी भक्ति में लगे हुए हैं।
