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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.20.217 
विष्णु - काञ्चीते विष्णु, हरि रहे, मायापुरे ।
ऐछे आर नाना मूर्ति ब्रह्माण्ड - भितरे ॥217॥
 
 
अनुवाद
“विष्णुकांची में भगवान विष्णु हैं, मायापुर में भगवान हरि हैं, तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अन्य अनेक रूप हैं।
 
“Lord Vishnu is in Vishnukanchi, Lord Hari is in Mayapur and there are many forms in the entire universe.
तात्पर्य
ये सभी रुप मूर्ति रुप है और इनकी मंदिरों में पूजा की जाती है। इनके नाम हैं मथुरा में केशव, नीलाचल में पुरुषोत्तम या जगन्नाथ, प्रयाग में श्री बिंदु माधव, मान्दर में मधुसूदन और केरल, दक्षिण भारत में स्थित आनंदारण्य में वासुदेव, पद्मनभ और जनार्दन। विष्णु-कांची में भगवान वरदराज हैं और मायपुर में हरि हैं, जो भगवान चैतन्य का जन्म स्थल है। इस प्रकार पूरे ब्रह्मांड में विभिन्न स्थानों पर मंदिरों में भिन्न-भिन्न देवता हैं जो भक्तों पर अपनी अकारण दया बरसाते हैं। ये सभी देवता रूप वैकुण्ठों के आध्यात्मिक जगत की मूर्तियों से भिन्न नहीं हैं। हालाँकि, अर्चा-मूर्ति, भगवान के आराध्य देव रूप, भौतिक तत्वों से बने प्रतीत होते हैं, यह आध्यात्मिक वैकुंठलोक में पाये जाने वाले आध्यात्मिक रूपों के समान हैं। हालाँकि, मंदिर में देवता भक्त की भौतिक आँखों को दिखाई देता है। भौतिक, सशर्त जीवन में किसी के लिए भगवान के आध्यात्मिक रूप को देखना संभव नहीं है। हम पर अकारण दया करने के लिए, भगवान अर्चा-मूर्ति के रूप में प्रकट होते हैं ताकि हम उन्हें देख सकें। अर्चा-मूर्ति को पत्थर या लकड़ी से बना हुआ मानना वर्जित है। पद्म पुराण में कहा गया है:

आर्च्ये विष्णौ शिला-धीर् गुरुषु नर-मतिर् वैष्णवे जाती-बुद्धिः

विष्णोर वा वैष्णवानां कलि-मल-मथने पाघ-तीर्थे ’म्बु-बुद्धिः

श्री-विष्णोर नामनी मंत्रे सकल-कलुष-हे शब्द-सामान्य-बुद्धिः

विष्णौ सर्वेश्वरेषे तदितर-सम-धीर् यस्य वा नारकी सः

किसी को भी मंदिर में देवता को पत्थर या लकड़ी से बना हुआ नहीं मानना चाहिए, और न ही किसी को आध्यात्मिक गुरु को एक सामान्य मनुष्य मानना चाहिए। किसी को वैष्णव को एक विशेष जाति या संप्रदाय का नहीं मानना चाहिए, और किसी को चरणामृत या गंगा के पानी को सामान्य पानी जैसा नहीं मानना चाहिए। और न ही किसी को हरे कृष्ण महा-मंत्र को भौतिक कंपन मानना चाहिए। भौतिक जगत में कृष्ण के ये सभी विस्तार केवल भगवान की दया और अपने भक्तों को सुविधा देने की इच्छा का प्रदर्शन है जो भौतिक जगत में उनकी भक्ति में लगे हुए हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)