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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  2.20.173 
अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते ।
यजन्ति त्वन्मयास्त्वां वै बहु - मूक - मूर्तिकम् ॥173॥
 
 
अनुवाद
"विभिन्न वैदिक शास्त्रों में विभिन्न प्रकार के स्वरूपों की पूजा के लिए निर्धारित नियम और विनियामक सिद्धांत हैं। जब कोई इन विधि-विधानों से शुद्ध हो जाता है, तो वह आपकी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करता है। अनेक रूपों में प्रकट होने पर भी आप एक ही हैं।"
 
"The various Vedic scriptures prescribe the rituals for worshipping these various forms. When a person is purified by these rituals, he worships You, the Supreme Personality of Godhead. Although You appear in many forms, You are one."
तात्पर्य
यह श्लोक श्रीमद-भागवतम (10.40.7) से उद्धृत किया गया है। वेदों में कहा गया है कि एक से अनेक होते हैं (एको बहु स्याम)। भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व स्वयं को विभिन्न रूपों में विस्तारित करते हैं - विष्णु-तत्व, जीव-तत्व और शक्ति-तत्व।

वैदिक साहित्यों के अनुसार, इन सभी रूपों की पूजा के लिए अलग-अलग नियमित सिद्धांत हैं। यदि कोई वैदिक साहित्यों का लाभ उठाता है और नियमों एवं विनियमों का पालन करके खुद को शुद्ध करता है, तो अंततः वह भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण की पूजा करता है। कृष्ण ने भगवद-गीता (4.11) में कहा है: मम वर्त्मनुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:। देवताओं की पूजा एक अर्थ में भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा है, लेकिन ऐसी पूजा को अवधी-पूर्वकम्, अनुचित कहा जाता है। वास्तव में देवता पूजा अविवेकी मनुष्यों के लिए है। जो बुद्धिमान है, वह भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के शब्दों पर विचार करता है: सर्व धर्मान् परित्यज्य मां एकं शरणं व्रज। जो देवताओं की पूजा करता है, वह भगवान सर्वोच्च की अप्रत्यक्ष पूजा करता है, लेकिन प्रकट शास्त्रों के अनुसार, उनकी अप्रत्यक्ष रूप से पूजा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई उनकी सीधे पूजा कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)