वैदिक साहित्यों के अनुसार, इन सभी रूपों की पूजा के लिए अलग-अलग नियमित सिद्धांत हैं। यदि कोई वैदिक साहित्यों का लाभ उठाता है और नियमों एवं विनियमों का पालन करके खुद को शुद्ध करता है, तो अंततः वह भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण की पूजा करता है। कृष्ण ने भगवद-गीता (4.11) में कहा है: मम वर्त्मनुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:। देवताओं की पूजा एक अर्थ में भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा है, लेकिन ऐसी पूजा को अवधी-पूर्वकम्, अनुचित कहा जाता है। वास्तव में देवता पूजा अविवेकी मनुष्यों के लिए है। जो बुद्धिमान है, वह भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के शब्दों पर विचार करता है: सर्व धर्मान् परित्यज्य मां एकं शरणं व्रज। जो देवताओं की पूजा करता है, वह भगवान सर्वोच्च की अप्रत्यक्ष पूजा करता है, लेकिन प्रकट शास्त्रों के अनुसार, उनकी अप्रत्यक्ष रूप से पूजा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई उनकी सीधे पूजा कर सकता है।
