सभी प्रकट शास्त्रों और वैदिक निषेधाज्ञाओं का लक्ष्य कृष्ण है, जैसा कि उन्होंने स्वयं भगवद-गीता में कहा है (15.15): वैदिस च सर्वैर अहम् एव वेद्यः। चूंकि वेदों में कहा गया है कि कोई कृष्ण को खोजे और उनके चरणकमलों का आश्रय ले, और चूंकि भक्तिपूर्ण सेवा के बिना कोई वैदिक प्रक्रिया किसी को भी ऐसा करने में सक्षम नहीं करेगी, इसलिए भक्तिपूर्ण सेवा का आश्रय लेना होगा। भगवद-गीता के अनुसार (18.55), केवल भक्ति प्रक्रिया को ही निश्चित कहा गया है। भक्त्या माम् अभिजानाति। यह वेदों का निर्णायक कथन है, और यदि व्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व कृष्ण की खोज करने में गंभीर है तो उसे इस प्रक्रिया को स्वीकार करना होगा। इस संबंध में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने निम्नलिखित कथन दिया है: "पूर्वी दिशा भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा का प्रतिनिधित्व करती है। दक्षिणी दिशा फलदायी गतिविधि (कर्मकांड) की प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करती है, जो भौतिक लाभ में समाप्त होती है। पश्चिमी दिशा ज्ञानकांड, मानसिक अनुमान की प्रक्रिया, या कभी-कभी सिद्धि-कांड, रहस्यवादी योग प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है। उत्तरी दिशा रहस्यमय योग का प्रतिनिधित्व करती है, या कभी-कभी सट्टा विधि का।" यह केवल पूर्वी दिशा, भक्ति सेवा, है जो व्यक्ति को जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। दक्षिणी दिशा में, फलदायी गतिविधियाँ हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति यमराज की सजा के अधीन होता है। जब कोई व्यक्ति फलदायी गतिविधि की व्यवस्था का अनुसरण करता है, तो उसकी भौतिक इच्छाएँ प्रमुख बनी रहती हैं। परिणामस्वरूप इस प्रक्रिया के परिणामों की तुलना ततैयों और भौंरों से की जाती है। जीवित प्राणी फलदायी गतिविधि के ततैयों और भौंरों द्वारा काटा जाता है और इस प्रकार जन्म के बाद भौतिक अस्तित्व में पीड़ित होता है। व्यक्ति इस प्रक्रिया का पालन करके भौतिक इच्छाओं से मुक्त नहीं हो सकता। भौतिक भोग की प्रवृत्ति कभी समाप्त नहीं होती। इसलिए जन्म और मृत्यु का चक्र जारी रहता है, और आत्मा सदैव पीड़ित होती रहती है।
रहस्य योग प्रक्रिया की तुलना एक काले साँप से की जाती है जो जीवित प्राणी को निगल जाता है और उसे जहर का इंजेक्शन लगाता है। योग प्रणाली का अंतिम लक्ष्य निरपेक्ष के साथ एक होना है। इसका अर्थ है किसी के निजी अस्तित्व को समाप्त करना। लेकिन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के आध्यात्मिक भाग और पार्सल का एक शाश्वत व्यक्तिगत अस्तित्व है। भगवद-गीता पुष्टि करती है कि व्यक्तिगत आत्मा अतीत में मौजूद थी, वर्तमान में मौजूद है और भविष्य में एक व्यक्ति के रूप में मौजूद रहेगी। कृत्रिम रूप से निरपेक्ष के साथ एक होने का प्रयास करना आत्मघाती है। कोई अपनी प्राकृतिक स्थिति का नाश नहीं कर सकता।
समृद्धि का रक्षक यक्ष, किसी को भी भोग के लिए समृद्धि ले जाने की अनुमति नहीं देगा। ऐसा राक्षस बस अशांति पैदा करेगा। दूसरे शब्दों में, भक्त अपनी भौतिक संसाधनों पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की दया पर निर्भर रहेगा, जो वास्तविक सुरक्षा दे सकता है। इसे रक्षिष्यतिति विश्वास या (भक्तिविनोद ठाकुर के शरणागति की बांग्ला कविता में) 'अवश्य रक्षिबे कृष्ण' - विश्वास पालन कहा जाता है। समर्पित आत्मा को इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि उसका वास्तविक रक्षक कृष्ण है, न कि उसके भौतिक अधिग्रहण।
इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखने पर, कृष्ण की भक्ति साधना ही जीवात्मा का असली खजाना है। जब कोई भक्ति साधना के मंच तक पहुँच जाता है, तो वह सर्वोच्च भगवान के साथ सदैव वैभवशाली बना रहता है। जो कोई भक्ति साधना से रहित है उसे योग प्रणाली के काले नाग ने निगला है और कर्मकांड के भौंरों ने उसे काटा है, और वह लगातार भौतिक दुखों से घिरा रहता है। कई बार जीवात्मा को आध्यात्मिक जीवन में लीन होने की कोशिश में गुमराह कर दिया जाता है, वह स्वयं को भी भगवान के समान मानने लगता है। इसका अर्थ यह है कि जब वह आध्यात्मिक मंच पर पहुँचता है, तो वह परेशान हो जाता है और पुनः भौतिक मंच पर लौट जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार (10.2.32):
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनो
त्वय्यस्ताभावदविशुद्धबुद्धयः
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतत्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः
ऐसे लोग संन्यासी बन सकते हैं, लेकिन जब तक वे कृष्ण के चरण कमलों की शरण नहीं लेते, तब तक वे भौतिक मंच पर वापस आते रहेंगे और मानवता के कार्य करते रहेंगे। इस तरह से, किसी का आध्यात्मिक जीवन नष्ट हो जाता है। इसे काले नाग द्वारा खाए जाने के रूप में समझा जाना चाहिए।
