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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.20.127 
इहाते दृष्टान्त - यैछे दरिद्रेर घरे ।
‘सर्वज्ञ’ आसि’ दुःख देखि’ पुछये ताहारे ॥127॥
 
 
अनुवाद
"निम्नलिखित दृष्टान्त दिया जा सकता है। एक बार एक विद्वान ज्योतिषी एक गरीब व्यक्ति के घर आया और उसकी व्यथित स्थिति देखकर उससे प्रश्न किया।
 
"The following illustration may be given. Once a learned astrologer came to the house of a poor man and seeing his miserable condition, he asked.
तात्पर्य
कभी-कभी हम किसी ज्योतिषी या हस्तरेखा विशेषज्ञ के पास जाते हैं जब हम संकट में होते हैं या जब हम भविष्य जानना चाहते हैं। सशर्त जीवन में जीवित प्राणी हमेशा भौतिक अस्तित्व के त्रिविध दुखों से परेशान रहता है। परिस्थितियों में, वह अपनी स्थिति के बारे में जिज्ञासु है। उदाहरण के लिए, सनातन गोस्वामी ने परमेश्वर श्री चैतन्य महाप्रभु से संपर्क किया और उनसे पूछा कि वह संकट की स्थिति में क्यों है। यह सभी सशर्त आत्माओं की स्थिति है। हम हमेशा संकट की स्थिति में रहते हैं, और एक बुद्धिमान व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु हो जाता है। इस स्थिति को ब्रह्म-जिज्ञासा कहा जाता है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा (वेदांत-सूत्र 1.1.1)। ब्रह्म यहाँ वैदिक साहित्य को दर्शाता है। सशर्त आत्मा हमेशा संकट की स्थिति में क्यों है, यह जानने के लिए वैदिक साहित्य से परामर्श करना चाहिए। वैदिक साहित्य सशर्त आत्मा को भौतिक अस्तित्व की दुखद स्थितियों से मुक्त करने के लिए हैं। इस अध्याय में, ज्योतिषी सर्वज्ञ और गरीब आदमी की कहानी बहुत शिक्षाप्रद है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)