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अनुवाद
“जब जीव कृष्ण से पृथक भौतिक शक्ति द्वारा आकृष्ट होता है, तो वह भय से अभिभूत हो जाता है। चूँकि वह भौतिक शक्ति द्वारा भगवान से पृथक हो जाता है, इसलिए उसकी जीवन-धारणा उलट जाती है। दूसरे शब्दों में, वह कृष्ण का शाश्वत सेवक न होकर कृष्ण का प्रतिद्वंद्वी बन जाता है। इसे विपर्ययोस्मृतिः कहते हैं। इस भूल को दूर करने के लिए, जो वास्तव में विद्वान और उन्नत है, वह भगवान की पूजा अपने आध्यात्मिक गुरु, आराध्य देव और जीवन के स्रोत के रूप में करता है। इस प्रकार वह अनन्य भक्ति की विधि द्वारा भगवान की पूजा करता है।”
“When a living entity is attracted by such material energy as is separate from Krishna, he becomes overcome with fear. Being separated from the Supreme Personality of Godhead by material energy alters his outlook on life. In other words, instead of being a constant servant of Krishna, he becomes a competitor of Krishna. This is called viparyayo'smriti:. To overcome this mistake, a truly learned and advanced person worships the Supreme Personality of Godhead as his guru, worshipable deity, and source of life. In this way, he worships the Lord with the method of exclusive devotion.”
तात्पर्य
यह श्रीमद्-भागवतम (११.२.३७) का एक उद्धरण है। यह नौ योगेंद्रों नामक नौ संतों के व्यक्तित्वों में से एक कवि ऋषि द्वारा दिया गया एक निर्देश है। जब कृष्ण के पिता वसुदेव ने द्वारका में देवर्षि नारद से भक्ति सेवा के बारे में पूछा, तो उल्लेख किया गया कि पहले विदेह के राजा राजा निमी को नौ योगेंद्रों द्वारा निर्देश दिया गया था। जब श्री नारद मुनि ने भागवत-धर्म, भक्ति सेवा पर प्रवचन किया, तो उन्होंने संकेत दिया कि कैसे एक सशर्त आत्मा प्रभु की प्रेममयी पारलौकिक सेवा में संलग्न होकर मुक्त हो सकती है। भगवान सभी सशर्त आत्माओं का सुपरसोल, आध्यात्मिक गुरु और पूजनीय देवता है। कृष्ण न केवल सभी जीवित संस्थाओं के लिए सर्वोच्च पूज्य देवता हैं, बल्कि वह गुरु, या कैत्य-गुरु, सुपरसोल भी हैं, जो हमेशा जीवित संस्था को अच्छी सलाह देते हैं। दुर्भाग्य से जीवित प्राणी सर्वोच्च व्यक्ति के निर्देशों की उपेक्षा करता है। इस प्रकार वह भौतिक ऊर्जा के साथ पहचान रखता है और फलस्वरूप भौतिक शरीर को स्वयं के रूप में स्वीकार करने और भौतिक शरीर से संबंधित साज-सामान को अपनी संपत्ति मानने से उत्पन्न होने वाले एक प्रकार के भय से दब जाता है। सभी प्रकार के सफलतापरक परिणाम वास्तव में आत्मा से आते हैं, लेकिन क्योंकि वह अपने वास्तविक कर्तव्य को भूल गया है, वह भय और आसक्ति जैसे कई भौतिक परिणामों से शर्मिंदा है। एकमात्र उपाय प्रभु की सेवा में वापस लौटना है और इस तरह भौतिक प्रकृति के अवांछित उत्पीड़न से बचा जाना है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥