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अनुवाद
"भौतिक अवस्था में, जीवात्मा कभी उच्चतर लोकों और भौतिक समृद्धि की ओर अग्रसर होता है और कभी नारकीय स्थिति में डूब जाता है। उसकी अवस्था ठीक उस अपराधी के समान होती है जिसे राजा जल में डुबाकर और फिर जल से ऊपर उठाकर दण्ड देता है।
"In the material state, the living entity is sometimes elevated to higher planetary systems and material prosperity, and sometimes plunged into hell. His condition is like that of a criminal punished by a king by being repeatedly immersed in water and then lifted out.
तात्पर्य
बृहद-आरण्यक उपनिषद (4.3.16) में कहा गया है, असंगो ह्य अयं पुरुषः: जीव-संस्था हमेशा भौतिक दुनिया के संदूषण से मुक्त रहती है। जो भौतिक रूप से संक्रमित नहीं है और कृष्ण को अपना स्वामी मानकर नहीं भूलता है, उसे नित्य-मुक्त कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, जो भौतिक संदूषण से हमेशा के लिए मुक्त है, उसे नित्य-मुक्त कहा जाता है। अनादि काल से नित्य-मुक्त जीव-संस्था हमेशा कृष्ण का भक्त रहा है, और उसका एकमात्र प्रयास कृष्ण की सेवा करना रहा है। इस प्रकार वह कृष्ण के प्रति अपनी शाश्वत सेवाभाव को कभी नहीं भूलता है। कोई भी जीव-संस्था जो कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल जाती है, वह भौतिक स्थिति के प्रभुत्व में होती है। भगवान की दिव्य प्रेमी सेवा से वंचित होकर, वह फलदायी गतिविधि की प्रतिक्रियाओं के अधीन होता है। जब वह सांसारिक पवित्र गतिविधियों के कारण उच्च ग्रह प्रणालियों में पहुँच जाता है, तो वह खुद को अच्छी तरह से स्थित समझता है, लेकिन जब उसे दंडित किया जाता है, तो वह खुद को अनुचित रूप से स्थित मानता है। इस प्रकार भौतिक प्रकृति जीव-संस्था को पुरस्कार और दंड देती है। जब जीव-संस्था भौतिक रूप से संपन्न होती है, तो भौतिक प्रकृति उसे पुरस्कृत कर रही होती है। जब वह भौतिक रूप से शर्मिंदा होता है, तो भौतिक प्रकृति उसे दंडित कर रही होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥