कृष्ण भुलि’ सेइ जीव अनादि - बहिर्मुख ।
अतएव माया तारे देय संसार - दुःख ॥117॥
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अनुवाद
"कृष्ण को भूलकर, जीव अनादि काल से बाह्य रूप से आकर्षित होता आया है। इसलिए माया उसे इस भौतिक जीवन में सभी प्रकार के दुःख देती है।
“Since eternity, the living entity has been attracted by the external form, forgetting Krishna. Therefore, Maya gives him all kinds of suffering in this material world.
तात्पर्य
जब जीव अपनी संवैधानिक स्थिति, कि वे कृष्ण के अनंत सेवक हैं, को भूल जाता है, तो वह तुरंत मायावी, बाहरी उर्जा के जाल में फंस जाता है। जीव मूल रूप से कृष्ण का अंश है और इसलिए कृष्ण की श्रेष्ठ उर्जा है। वह अकल्पनीय सूक्ष्म उर्जा से संपन्न है जो शरीर के अंदर अकल्पनीय रूप से काम करती है। हालाँकि, जीव अपनी स्थिति को भूल कर भौतिक उर्जा में स्थित हो जाता है। जीव को सीमांत उर्जा कहा जाता है क्योंकि स्वभाव से वह आध्यात्मिक है लेकिन भूलवश वह भौतिक उर्जा में स्थित है। इस प्रकार उसके पास या तो भौतिक उर्जा में या आध्यात्मिक उर्जा में रहने की शक्ति है, और इस कारण उसे सीमांत उर्जा कहा जाता है। सीमांत स्थिति में होने के कारण, वह कभी-कभी बाहरी, मायावी उर्जा की ओर आकर्षित होता है, और यही उसके भौतिक जीवन की शुरुआत है। जब वह भौतिक उर्जा में प्रवेश करता है, तो वह समय के त्रिविध मापन - अतीत, वर्तमान और भविष्य - के अधीन हो जाता है। अतीत, वर्तमान और भविष्य केवल भौतिक संसार से संबंधित हैं; वे आध्यात्मिक संसार में मौजूद नहीं हैं। जीव अनंत है, और वह इस भौतिक संसार के निर्माण से पहले मौजूद था। दुर्भाग्य से वह कृष्ण के साथ अपने संबंध को भूल गया है। जीव के भूलने को यहाँ अन आदि के रूप में वर्णित किया गया है, जो इंगित करता है कि यह अनादि काल से है। किसी को यह समझना चाहिए कि कृष्ण के साथ प्रतिस्पर्धा में स्वयं का आनंद लेने की इच्छा के कारण, जीव भौतिक अस्तित्व में आता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥