श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  2.20.110 
एक - देश - स्थितस्याग्ने र्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा ।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथेदमखिलं जगत् ॥110॥
 
 
अनुवाद
“जिस प्रकार एक स्थान पर स्थित अग्नि का प्रकाश सर्वत्र फैल जाता है, उसी प्रकार भगवान परब्रह्म की शक्तियां इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र फैली हुई हैं।”
 
“Just as the light of a fire kept at one place spreads everywhere, similarly the powers of the Supreme Brahman, that is, the Supreme Personality of Godhead, are spread throughout this universe.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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