श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 108-109
 
 
श्लोक  2.20.108-109 
जीवेर ‘स्वरूप’ हय - कृष्णेर ‘नित्य - दास’ ।
कृष्णेर ‘तटस्था - शक्ति’ ‘भेदाभेद - प्रकाश’ ॥108॥
सूर्यांश - किरण, यैछे अग्नि - ज्वाला - चय ।
स्वाभाविक कृष्णेर तिन - प्रकार ‘शक्ति’ हय ॥109॥
 
 
अनुवाद
"जीवात्मा की स्वाभाविक स्थिति कृष्ण का शाश्वत सेवक होना है क्योंकि वह कृष्ण की सीमांत शक्ति है और भगवान से एकरूप तथा भिन्न, सूर्य की रोशनी या अग्नि के अणुकण की तरह, एक ही समय में प्रकट होता है। कृष्ण की शक्ति तीन प्रकार की होती है।
 
"Being the eternal servant of Krishna is the legitimate position of the living entity, for the living entity is Krishna's neutral energy and is at once identical and distinct from the Lord, just as a particle of sunlight or fire is. There are three types of Krishna's energy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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