श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.20.100 
आपनार हिताहित किछुइ ना जानि! ।
ग्राम्य - व्यवहारे पण्डित, ताइ सत्य मानि ॥100॥
 
 
अनुवाद
"मुझे नहीं मालूम कि मेरे लिए क्या लाभदायक है और क्या हानिकारक। फिर भी, सामान्य व्यवहार में लोग मुझे विद्वान मानते हैं, और मैं भी अपने आप को ऐसा ही मानता हूँ।"
 
"I don't know what is beneficial and what is harmful to me. Yet, in general, people consider me a learned scholar, and I consider myself to be one too."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)