‘दुँहार मुखे कृष्ण - नाम करिछे नर्तन ।
एइ - दुइ ‘अधम’ नहे, हय ‘सर्वोत्तम’ ॥71॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
वल्लभ भट्टाचार्य ने कहा, "चूँकि ये दोनों निरंतर कृष्ण के पवित्र नाम का जप करते रहते हैं, तो वे अछूत कैसे हो सकते हैं? इसके विपरीत, वे परम श्रेष्ठ हैं।"
Vallabha Bhattacharya said, "Since these two are constantly chanting the name of Krishna, how can they be untouchable? On the contrary, they are the best."
तात्पर्य
वल्लभाचार्य द्वारा भाइयों की श्रेष्ठ स्थिति स्वीकार करना उन लोगों के लिए एक सबक के रूप में काम करना चाहिए जो ब्राह्मण होने के नाते गर्व करते हैं। कभी-कभी तथाकथित ब्राह्मण हमारे यूरोपीय और अमेरिकी शिष्यों को भक्त या ब्राह्मण के रूप में मान्यता नहीं देते हैं, और कुछ ब्राह्मण इतने अभिमानी होते हैं कि वे उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं करने देते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ एक महान शिक्षा देते हैं। यद्यपि वल्लभाचार्य ब्राह्मणवाद के एक महान अधिकारी और एक विद्वान थे, उन्होंने स्वीकार किया कि जो भगवान के पवित्र नाम का जाप करते हैं, वे वास्तविक ब्राह्मण और वैष्णव हैं और इसलिए वे श्रेष्ठ हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥