श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  2.19.232 
कान्त - भावे निजाङ्ग दिया करेन सेवन ।
अतएव मधुर - रसेर हय ‘पञ्च’ गुण ॥232॥
 
 
अनुवाद
"वैवाहिक प्रेम के मंच पर, भक्त अपना शरीर भगवान की सेवा में अर्पित कर देता है। इस प्रकार इस मंच पर पाँचों रसों के दिव्य गुण विद्यमान होते हैं।"
 
"In the sweet rasa, the devotee offers his body in the service of the Lord. Therefore, this rasa contains the divine qualities of all five rasas.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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