भुक्ति - मुक्ति आदि - वाञ्छा यदि मने हय ।
साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय ॥175॥
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अनुवाद
“यदि कोई व्यक्ति भौतिक भोग या भौतिक मुक्ति की इच्छा से ग्रस्त है, तो वह भगवान की शुद्ध प्रेममयी सेवा के स्तर तक नहीं पहुँच सकता, भले ही वह नियमित विनियामक सिद्धांतों के अनुसार सतही तौर पर भक्ति सेवा प्रदान कर सकता है।
“If one is afflicted by the desire for material enjoyment or material liberation, he cannot rise to the level of pure loving devotion, even if he is performing superficial devotion according to the ordinary rituals.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर उल्लेख करते हैं कि यदि कोई अपने दिल में अच्छे काम के फल का आनंद लेने की इच्छा रखता है, या भौतिक दुनिया से शर्मिंदा होकर भौतिक उलझन से बाहर निकलने की इच्छा रखता है, तो वह कभी भी भक्ति की दिव्य मधुरता को प्राप्त नहीं कर पाएगा। दूसरे शब्दों में, भक्ति सेवा प्रदान करते समय भौतिक लाभ की इच्छा नहीं करनी चाहिए। यदि कोई सभी साठ-चार नियमित सिद्धांतों का पालन करता है, तब भी वह दूषित दिल से शुद्ध भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥