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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 148
 
 
श्लोक  2.19.148 
कोटि - ज्ञानि - मध्ये हय एक - जन ‘मुक्त’ ।
कोटि - मुक्त - मध्ये ‘दुर्लभ’ एक कृष्ण - भक्त ॥148॥
 
 
अनुवाद
“ऐसे लाखों बुद्धिमान पुरुषों में से कोई एक ही वास्तव में मुक्त हो सकता है, और ऐसे लाखों मुक्त व्यक्तियों में से भगवान कृष्ण का शुद्ध भक्त मिलना बहुत कठिन है।
 
“Out of millions of such enlightened people, only one is truly liberated, and among millions of such liberated people, it is extremely rare to find a pure devotee of Krishna.
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम (10.2.32) में कहा गया है कि अपने ज्ञान के ख़राब भंडार के कारण, ज्ञानी वास्तव में मुक्त नहीं होते हैं। वे केवल सोचते हैं कि वे मुक्त हो गए हैं। ज्ञान की पूर्णता तब होती है जब कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को जानने के स्तर पर पहुँचता है। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवान इति शब्द्यते। परम सत्य (सत्य-वस्तु) को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में वर्णित किया गया है। निरपेक्ष ब्रह्म और परमात्मा का ज्ञान तब तक अपूर्ण है जब तक कि कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को जानने के स्तर पर नहीं पहुँच जाता। इसलिए इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है, कोटि-मुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्ण-भक्त। जो लोग निरपेक्ष ब्रह्म या स्थानीयकृत परमात्मा के ज्ञान की खोज करते हैं, निश्चित रूप से उन्हें मुक्त माना जाता है, लेकिन उनके अपूर्ण ज्ञान के कारण उन्हें श्रीमद्-भागवतम में विमुक्त-मानिन: के रूप में वर्णित किया गया है। चूँकि उनका ज्ञान अपूर्ण है, इसलिए मुक्ति की उनकी अवधारणा भी अपूर्ण है। पूर्ण ज्ञान तब संभव है जब कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को जानता हो। भगवान कृष्ण द्वारा भगवद-गीता (5.29) में इसका समर्थन किया गया है:

भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम्

सुहृदं सर्व-भूतानां ज्ञात्वा माम शान्ति ऋच्छति

"मुझे अपने पूर्ण चेतना में जानने वाला, मुझे सभी बलिदानों और तपस्याओं का अंतिम लाभार्थी जानने वाला, सभी ग्रहों और देवताओं का सर्वोच्च भगवान, और सभी जीवित संस्थाओं का हितैषी और शुभचिंतक, भौतिक दुखों की पीड़ा से शांति प्राप्त करता है।"

कर्मियों, ज्ञानियों और योगियों के लिए अनुसंधान चल रहा है, लेकिन जब तक खोज पूरी नहीं हो जाती, तब तक कोई भी शांति प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए भगवद-गीता कहती है, ज्ञात्वा माम शान्ति ऋच्छति: कोई व्यक्ति वास्तव में शांति तभी प्राप्त कर सकता है जब वह कृष्ण को जानता हो। इसका वर्णन अगले श्लोक में किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)