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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  2.19.146 
वेद - निष्ठ - मध्ये अर्धेक वेद ‘मुखे’ माने ।
वेद - निषिद्ध पाप करे, धर्म नाहि गणे ॥146॥
 
 
अनुवाद
"मनुष्यों में, जो वैदिक सिद्धांतों का पालन करते हैं, उन्हें सभ्य माना जाता है। इनमें से लगभग आधे लोग केवल दिखावटी सेवा करते हैं, जबकि इन सिद्धांतों के विरुद्ध सभी प्रकार के पाप कर्म करते हैं। ऐसे लोग नियामक सिद्धांतों की परवाह नहीं करते।"
 
"Among humans, those who follow Vedic principles are considered civilized. Half of these people are ostentatious and commit all kinds of sinful acts against these principles. Such people do not care about the rules and regulations.
तात्पर्य
वेद शब्द का अर्थ “ज्ञान” है। सर्वोच्च ज्ञान का संबंध भगवान श्री हरि को समझने का होता है और साथ ही उनके साथ अपने रिश्तों को समझने और उसी के अनुसार कार्य करने का होता है। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार किए गए कार्यों को धर्म कहा जाता है। धर्म का मतलब है भगवान श्री हरि के आदेशों का पालन करना। वैदिक सिद्धांत भगवान श्री हरि द्वारा दिए गए आदेशों का संग्रह है। आर्य सभ्य इंसान हैं जो अनादि काल से वैदिक सिद्धांतों का पालन करते आ रहे हैं। वैदिक सिद्धांतों के इतिहास को कोई भी नहीं जानता है, जिसे इंसान परमात्मा को समझने के लिए सीखते आए हैं। साहित्य या ज्ञान जो परमात्मा को समझने में मदद करता है, उसे सही मायनों में धार्मिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन अलग-अलग जगहों, अनुयायियों और लोगों की समझने की क्षमता के मुताबिक धार्मिक व्यवस्था के कई अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं।

धार्मिक व्यवस्था का सबसे ऊँचा प्रकार श्रीमद्-भागवतम् (1.2.6) में इस प्रकार वर्णित किया गया है: स वं पुंसां परो धर्मों यतो भक्ति अदक्षजे। धर्म का सर्वोच्च रूप वह है जिसके द्वारा व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह से जान लेता है, जिसमें उनका रूप, नाम, गुण, लीलाएँ, आवास और सभी जगह मौजूद होना शामिल है। जब सब कुछ पूरी तरह से ज्ञात हो जाए, तो वह वैदिक ज्ञान की पूर्णता है। वैदिक ज्ञान की परिपूर्णता ईश्वर के गुणों का ज्ञान है। भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (15.15) में इसकी पुष्टि की है: वेदैश च सर्वैर अहं एव वेद्यः। वैदिक ज्ञान का उद्देश्य ईश्वर को समझना है। इसलिए वे लोग जो वास्तव में वैदिक ज्ञान का पालन कर रहे हैं और ईश्वर को तलाश रहे हैं, वे कभी भी भगवान श्री हरि के आदेशों के खिलाफ पापपूर्ण गतिविधियों को नहीं कर सकते हैं। हालाँकि, इस कलियुग में, हालाँकि लोग इतने सारे अलग-अलग तरह के धर्मों का पालन करने का दावा करते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर वैदिक शास्त्रों के आदेशों के खिलाफ पापी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ कहते हैं, वेद-निसिद्ध पाप करे, धर्म नाही गणे। इस युग में लोग धर्म का दावा तो कर सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे हर तरह के पाप करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)