धार्मिक व्यवस्था का सबसे ऊँचा प्रकार श्रीमद्-भागवतम् (1.2.6) में इस प्रकार वर्णित किया गया है: स वं पुंसां परो धर्मों यतो भक्ति अदक्षजे। धर्म का सर्वोच्च रूप वह है जिसके द्वारा व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह से जान लेता है, जिसमें उनका रूप, नाम, गुण, लीलाएँ, आवास और सभी जगह मौजूद होना शामिल है। जब सब कुछ पूरी तरह से ज्ञात हो जाए, तो वह वैदिक ज्ञान की पूर्णता है। वैदिक ज्ञान की परिपूर्णता ईश्वर के गुणों का ज्ञान है। भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (15.15) में इसकी पुष्टि की है: वेदैश च सर्वैर अहं एव वेद्यः। वैदिक ज्ञान का उद्देश्य ईश्वर को समझना है। इसलिए वे लोग जो वास्तव में वैदिक ज्ञान का पालन कर रहे हैं और ईश्वर को तलाश रहे हैं, वे कभी भी भगवान श्री हरि के आदेशों के खिलाफ पापपूर्ण गतिविधियों को नहीं कर सकते हैं। हालाँकि, इस कलियुग में, हालाँकि लोग इतने सारे अलग-अलग तरह के धर्मों का पालन करने का दावा करते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर वैदिक शास्त्रों के आदेशों के खिलाफ पापी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ कहते हैं, वेद-निसिद्ध पाप करे, धर्म नाही गणे। इस युग में लोग धर्म का दावा तो कर सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे हर तरह के पाप करते हैं।
