श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.19.141 
बालाग्र - शत - भागस्य शतधा कल्पितस्य च ।
भागो जीवः स विज्ञेय इति चाह परा श्रुतिः ॥141॥
 
 
अनुवाद
"यदि हम एक बाल के सिरे को सौ भागों में बाँट दें और फिर एक भाग लेकर उसे सौ भागों में बाँट दें, तो वह दस हज़ारवाँ भाग ही जीव का आयाम है। यही मुख्य वैदिक मंत्रों का निर्णय है।"
 
"If we divide the tip of a hair into a hundred parts and take one of these parts and divide it again into a hundred parts, that ten-thousandth part is the measure of the soul. This is the verdict of the main Vedic mantras."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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