भट्टाचार्य तबे क हे प्रभुर चरणे ।
‘आज्ञा देह’, याइ’ करि कृष्ण दरशने!’ ॥99॥
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अनुवाद
उस समय बलभद्र भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में प्रार्थना की, "कृपया मुझे भगवान कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन की अनुमति प्रदान करें।"
Then Balabhadra Bhattacharya requested at the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu, “Please allow me to go and have a direct darshan of Krishna.”
तात्पर्य
श्री चैतन्य महा प्रभु जिन चकित लोगों से मिलने गए थे वो वास्तव में भगवान कृष्ण को ही देख रहे थे, परन्तु उनको भ्रमवश ये लग रहा था कि भगवान कृष्ण कालिया घाट पर आ गए हैं। उन्होंने सभी कहा कि उन्होंने कृष्ण को सीधे कालिया महान साँप के सिर पर क्रीड़ा करते हुए देखा था और कालिया के सिर पर जड़ित रत्न बहुत अधिक चमक रहे थे। चूँकि उन्हें अपने अपूर्ण ज्ञान से आभास हो रहा था, उन्होंने श्री चैतन्य महा प्रभु को एक सामान्य मनुष्य और घाट पर मल्लाह के दीये को कृष्ण के रूप में देखा था। किसी चीज को उसके वास्तविक रूप में देखने के लिए किसी आध्यात्मिक गुरु की कृपा होना आवश्यक होता है; अन्यथा, अगर कोई सीधे कृष्ण को देखने की कोशिश करता है, तो वह एक साधारण मनुष्य को कृष्ण और कृष्ण को एक साधारण मनुष्य समझ सकता है। हर किसी को कृष्ण को वैदिक साहित्य के माध्यम से देखना होता है जिसे आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा समझाया गया है। एक सच्चा व्यक्ति श्री गुरुदेव, जो कि आध्यात्मिक गुरु होते हैं, के पारदर्शी माध्यम से कृष्ण को देख पाता है। जब तक किसी को आध्यात्मिक गुरु का ज्ञान नहीं मिल जाता है, वह चीजों को उनके वास्तविक रूप में नहीं देख सकता है, भले ही वह आध्यात्मिक गुरु के साथ लगातार रहे। कालिया घाट पर घटित ये घटना उन लोगों के लिए बहुत शिक्षाप्रद है जो कृष्ण चेतना में आगे बढ़ने के लिए उत्सुक हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥