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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.18.3 
एइ - मत महाप्रभु नाचिते नाचिते ।
‘आरिट्’ - ग्रामे आसि’ ‘बाह्य’ हैल आचम्बिते ॥3॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु आनंद में नाच रहे थे, लेकिन जब वे अरिष्ट ग्राम में पहुंचे तो उनकी इन्द्रिय-बोध जागृत हो गई।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu used to dance in a state of love, but when he came to Arit village, his external consciousness became awakened.
तात्पर्य
आड़ित-ग्राम को आरिष्ट-ग्राम भी कहा जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु समझ गए कि इस गाँव में श्री कृष्ण ने आरिष्टासुर का वध किया था। वहाँ रहते हुए उन्होंने राधा-कुंड के बारे में पूछताछ की, लेकिन कोई नहीं बता सका कि वह कहाँ था। उनके साथ मौजूद ब्राह्मण भी उसका पता नहीं लगा पाए। श्री चैतन्य महाप्रभु तब समझ गए कि राधा-कुंड और श्याम-कुंड के नाम से जाने जाने वाले पवित्र स्थान उस समय सभी की दृष्टि से ओझल हो गए हैं। इसलिए उन्होंने राधा-कुंड और श्याम-कुंड की खोज की, जो दो धान के खेतों में पानी के दो जलाशय थे। हालाँकि बहुत कम पानी था, श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वज्ञ थे और समझ सकते थे कि पहले इन दो तालाबों को श्री राधा-कुंड और श्याम-कुंड कहा जाता था। इस प्रकार राधा-कुंड और श्याम-कुंड की खोज की गई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)