vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 2: मध्य लीला
»
अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण
»
श्लोक 183
श्लोक
2.18.183
प्रभु कहेन, - ठक् नहे, मोर ‘सङ्गी’ जन ।
भिक्षुक सन्न्यासी, मोर नाहि किछु धन ॥183॥
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "ये दुष्ट नहीं हैं। ये मेरे सहयोगी हैं। संन्यासी भिक्षुक होने के नाते, मेरे पास कुछ भी नहीं है।"
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "These four are not thugs. They are my companions. As sannyasi mendicants, I have nothing."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×