श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  2.18.183 
प्रभु कहेन, - ठक् नहे, मोर ‘सङ्गी’ जन ।
भिक्षुक सन्न्यासी, मोर नाहि किछु धन ॥183॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "ये दुष्ट नहीं हैं। ये मेरे सहयोगी हैं। संन्यासी भिक्षुक होने के नाते, मेरे पास कुछ भी नहीं है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "These four are not thugs. They are my companions. As sannyasi mendicants, I have nothing."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)