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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  2.18.134 
प्रातः - काले अक्रूरे आसि’ रन्धन करिया ।
प्रभुरे भिक्षा देन शालग्रामे समर्पिया ॥134॥
 
 
अनुवाद
प्रातःकाल वे अक्रूर तीर्थ आते और भोजन पकाते। फिर उसे शालग्राम शिला में अर्पित करके श्री चैतन्य महाप्रभु को भोग लगाते।
 
In the morning, he would come to Akrura Tirtha and cook food. After offering it to the Shalagram stone, he would give it to Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
भारत के पाँच उत्तरी भागों से आने वाले ब्राह्मणों को पंच-गौड़-ब्राह्मण के नाम से जाना जाता है। इसी तरह, पाँच दक्षिणी भागों से आने वाले ब्राह्मणों को पंच-दक्षिणात्य-ब्राह्मण के नाम से जाना जाता है। उत्तरी भारत के भाग हैं- कान्यकुब्ज, सारस्वत, गौड़, मैथिल और उत्कल। दक्षिणी भारत के भाग हैं- आंध्र, कर्नाटक, गुजरात, द्राविड़ और महाराष्ट्र। इन भागों से आने वाले ब्राह्मण वैदिक सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करते हैं, और उन्हें शुद्ध ब्राह्मण माना जाता है। वे वैदिक सिद्धांतों का सख्ती से पालन करते हैं और तांत्रिक कुकर्मों से अपवित्र नहीं होते। इन सभी ब्राह्मणों ने आदर के साथ चैतन्य महाप्रभु को दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)