प्रभु कहे, - ‘विष्णु’ ‘विष्णु’ इहा ना कहिबा! ।
जीवाधमे ‘कृष्ण’ - ज्ञान कभु ना करिबा! ॥111॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरंत कहा, "विष्णु! विष्णु! मुझे भगवान मत कहो। जीव कभी कृष्ण नहीं बन सकता। ऐसी बात भी मत कहो!"
Sri Chaitanya Mahaprabhu immediately said, "Vishnu! Vishnu! Do not call me God. A living being can never become Krishna. Never say such a thing!"
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरंत कहा कि एक जीव, फिर चाहे वह कितना भी महान क्यों न हो, उसकी तुलना कभी भी परमेश्वर से नहीं की जानी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी उपदेश मायावाद स्कूल के अद्वैत दर्शन का खंडन करते हैं। कृष्ण चेतना का केंद्रीय बिंदु यह है कि जीव, सजीव इकाई, को कभी भी कृष्ण या विष्णु के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण को निम्नलिखित श्लोकों में विस्तार से बताया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥