यह मायावाद दर्शन का दृष्टिकोण है। मायावाद दर्शन उस अवैयक्तिक दृष्टिकोण का समर्थन करता है कि नारायण, परम विभूति भगवान् का कोई रूप नहीं है। कोई भी व्यक्ति नारायण को अवैयक्तिक ब्रह्म के रूप में कल्पना कर सकता है - जैसे कि विष्णु, भगवान शिव, विवस्वान, गणेश या देवी दुर्गा। मायावाद दर्शन के अनुसार, जब कोई व्यक्ति संन्यासी बन जाता है, तो उसे चलते-फिरते नारायण के रूप में माना जाना चाहिए। मायावाद दर्शन मानता है कि वास्तविक नारायण चलते नहीं हैं, क्योंकि अवैयक्तिक होने के कारण उनके पैर नहीं हैं। इस प्रकार मायावाद दर्शन के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति संन्यासी बन जाता है, वह खुद को नारायण घोषित कर देता है। मूर्ख लोग ऐसे साधारण मनुष्यों को परम देव के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। इसे विवर्त-वाद कहा जाता है।
इस संबंध में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि जंगम-नारायण का अर्थ है कि अवैयक्तिक ब्रह्म एक आकृति ग्रहण करता है और मायावादी संन्यासी के रूप में यहाँ और वहाँ घूमता है। मायावाद दर्शन इसकी पुष्टि करता है। दंडग्रहणमात्रेण नरो नारायणो भवेत्: "केवल संन्यास के आदेश के दण्ड को स्वीकार करने से, कोई व्यक्ति तुरंत नारायण में बदल जाता है।" इसलिए मायावादी संन्यासी एक-दूसरे को ओम नमो नारायणाय कहकर संबोधित करते हैं। इस तरह एक नारायण दूसरे नारायण की पूजा करता है।
वास्तव में एक साधारण मनुष्य नारायण नहीं बन सकता। प्रमुख मायावादी संन्यासी, श्री शंकराचार्य, कहते हैं, नारायण: परो व्यक्त: "नारायण इस भौतिक संसार की रचना नहीं हैं। नारायण भौतिक सृजन से ऊपर हैं।" अपने ज्ञान के खराब भंडार के कारण, मायावादी संन्यासी सोचते हैं कि नारायण, परम सत्य, एक मनुष्य के रूप में जन्म लेता है और जब उन्हें यह एहसास होता है, तो वे फिर से नारायण बन जाते हैं। वे कभी नहीं सोचते कि परम देव भगवान नारायण मनुष्य के रूप में एक निम्न स्थिति क्यों स्वीकार करेंगे और फिर से नारायण कैसे बन जाएंगे जबकि वे पूर्ण हैं। नारायण अपूर्ण क्यों होंगे? उन्हें एक मनुष्य के रूप में क्यों प्रकट होना चाहिए? श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृंदावन में रहते हुए इन बिंदुओं को बहुत अच्छी तरह से समझाया था।
