षड् - दर्शन - व्याख्या विना कथा नाहि एथा ।
मिश्र कृपा करि’ मोरे शुनान कृष्ण - कथा ॥96॥
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अनुवाद
चन्द्रशेखर ने आगे कहा, "वाराणसी में छह दार्शनिक सिद्धांतों पर चर्चा के अलावा कोई और चर्चा नहीं होती। फिर भी, तपन मिश्र मुझ पर बहुत कृपालु रहे हैं, क्योंकि वे भगवान कृष्ण से संबंधित विषयों पर बोलते हैं।"
Chandrashekhar continued, "Nothing happens in Varanasi except the exposition of the six philosophies. Yet, Tapan Mishra is very kind to me because he tells stories about Krishna.
तात्पर्य
छह दार्शनिक सिद्धांत हैं (1) वैशेषिक, जिसे कणाद ऋषि ने स्थापित किया था, (2) न्याय, जिसे गौतम ऋषि ने स्थापित किया था, (3) योग, या रहस्यवाद, जिसे पतंजलि ऋषि ने स्थापित किया था, (4) सांख्य का दर्शन, जिसे कपिल ऋषि ने स्थापित किया था, (5) कर्म-मीमांसा का दर्शन, जिसे जैमिनी ऋषि ने स्थापित किया था, और (6) ब्रह्म-मीमांसा, या वेदांत का दर्शन, जो परम सत्य (जन्माद्यस्य यतः) का अंतिम निष्कर्ष है, जिसे वेदव्यास द्वारा स्थापित किया गया था। वास्तव में वेदांत दर्शन भक्तों के लिए है क्योंकि भगवद-गीता (15.15) में भगवान कृष्ण कहते हैं, वेदांते-कृद् वेद-विद एव चाहम्: "मैं वेदांत का संकलनकर्ता हूं, और मैं वेदों का ज्ञाता हूं।" व्यासदेव, कृष्ण का अवतार हैं, और परिणामस्वरूप कृष्ण वेदांत दर्शन के संकलनकर्ता हैं। इसलिए कृष्ण वेदांत दर्शन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से जानते हैं। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, जो भी कृष्ण से वेदांत दर्शन सुनता है वह वास्तव में वेदांत के वास्तविक अर्थ से अवगत होता है। मायावादियों ने खुद को वेदांती कहा है लेकिन वेदांत दर्शन के उद्देश्य को बिल्कुल भी नहीं समझते हैं। ठीक से शिक्षित नहीं होने के कारण, सामान्य लोग सोचते हैं कि वेदांत से शंकरीय व्याख्या का मतलब है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥