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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.17.95 
आपन - प्रारब्धे व सि’ वाराणसी - स्थाने ।
‘माया’, ‘ब्रह्म’ शब्द विना नाहि शुनि काणे ॥95॥
 
 
अनुवाद
“अपने पूर्व कर्मों के कारण मैं वाराणसी में निवास कर रहा हूँ, किन्तु यहाँ मुझे ‘माया’ और ‘ब्रह्म’ शब्दों के अतिरिक्त कुछ भी सुनाई नहीं देता।”
 
“I am living in Varanasi because of my past deeds, but here I hear nothing except the words ‘Maya’ and ‘Brahma’.”
तात्पर्य
वर्तमान छंद में "प्रारब्धे" ("अतीत कर्म") शब्द का महत्व है। चूँकि चंद्रशेखर भक्त थे, वे हमेशा कृष्ण और उनके दिव्य आमोद-प्रमोद के बारे में सुनने के लिए उत्सुक रहते थे। बनारस के अधिकांश निवासी निराकारवादी थे और हैं, जो भगवान शिव के उपासक हैं और पंचोपासना विधि के अनुयायी हैं। निराकारवादी निराकार ब्रम्हा का कल्पित रूप मानते हैं, और ध्यान करने में आसानी के लिए वे विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य और देवी दुर्गा के रूपों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वास्तव में, ये पंचोपासी किसी के भक्त नहीं हैं। जैसा कि कहाँ गया है कि सभी का नौकर बनना किसी का नौकर नहीं होना है। निराकारवादियों के लिए वाराणसी, या काशी, तीर्थ यात्रा का सबसे प्रमुख पवित्र स्थान है, और यह भक्तों के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है। एक वैष्णव विष्णु-तीर्थ, एक ऐसा स्थान जहाँ भगवान विष्णु के मंदिर विद्यमान हैं, में रहना पसंद करता है। वाराणसी में भगवान शिव के मंदिरों या पंचोपासी मंदिरों के कई सैकड़ों और हजारों मंदिर हैं। फलस्वरूप, चंद्रशेखर ने भगवान चैतन्य को सूचित किया कि उन्हें अपने पिछले बुरे कर्मों के कारण बनारस में रहने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिससे वे बहुत दुःखी हुए। जैसा कि भक्ति रसामृत सिंधु में कहा गया है, दुर्जात्य-आरंभकम पापम यत स्यात प्रारब्धम एव तत्: "अपने पिछले बुरे कर्मों के अनुसार, व्यक्ति निम्न स्तर पर जन्म लेता है।" लेकिन ब्रम्ह संहिता (5.54) में कहा गया है, कर्माणि निर्दहति किंतु च भक्ती-भाजाम्: "भक्ति सेवा में लगे हुए व्यक्ति के अतीत के कर्मों या दुष्कर्मों से कोई कर्म नहीं जुड़ा है।" एक भक्त कर्म फल, फलदायी कार्य का प्रभाव, के अधीन नहीं है। कर्म फल कर्मियों पर लागू होता है, भक्तों पर नहीं।

तीन प्रकार के भक्त होते हैं: वे जो सदा पारलौकिक मंच (नित्य-सिद्ध) पर होते हैं, वे जिन्हें भक्ति सेवा के निष्पादन (साधन-सिद्ध) से पारलौकिक मंच पर ऊपर उठाया गया है, और वे जो सिद्धि मंच (साधक) की ओर बढ़ने वाले नवोदित हैं। साधक धीरे-धीरे फलदायी प्रतिक्रिया से मुक्त हो रहे हैं। भक्ति रसामृत सिंधु (1.1.17) में भक्ति-योग के लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

क्लेश-घ्नी शुभ-दा मोक्ष- लघुत-कृत सु-दुर्लभा

संद्रानंद-विशेषात्मा श्री-कृष्णकर्षिणी च सा

भक्ति सेवा शुरुआती लोगों के लिए भी क्लेश-घ्नी है। इसका अर्थ है कि यह सभी प्रकार के दुखों को कम करता है या समाप्त करता है। शुभ-दा शब्द इंगित करता है कि भक्ति सेवा सभी अच्छे भाग्य प्रदान करती है, और कृष्णकर्षिणी शब्द इंगित करता है कि भक्ति सेवा धीरे-धीरे कृष्ण को भक्त की ओर आकर्षित करती है। फलस्वरूप, एक भक्त किसी भी पापपूर्ण प्रतिक्रिया के अधीन नहीं है। भगवद गीता (18.66) में कृष्ण कहते हैं:

सर्व-धर्मन् परित्यज्य माम एकम शरणं व्रज

अहं त्वाँ सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

"सभी प्रकार के धर्म को त्याग दो और सिर्फ मुझे शरण लो। मैं तुम्हें सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। चिंता मत करो।"

इस प्रकार, एक पूर्ण रूप से समर्पित, निष्ठावान भक्त को तुरंत सभी प्रकार की पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्ति मिलती है। पापपूर्ण गतिविधि के लिए सिद्धि के तीन चरण हैं। एक चरण में, व्यक्ति पापपूर्ण कार्य करता है, उसके पहले इस कार्य का बीज मौजूद होता है, और उससे पहले वह अज्ञानता होती है जिससे व्यक्ति पाप करता है। तीनों चरणों में दुख शामिल है। हालाँकि, कृष्ण अपने भक्त पर दयालु हैं, और परिणामस्वरूप वह तुरंत तीनों चरणों - पाप, पाप के बीज और अज्ञानता जो व्यक्ति को पाप की ओर ले जाती है - को समाप्त कर देते हैं। पद्म पुराण इस बात की पुष्टि करता है:

अप्रारब्ध-फलम पापम कूटम बीजम फलोनमुखम

क्रमेणैव प्रलीयेत विष्णु-भक्ति-रतात्मनाम

इस विषय की और व्याख्या के लिए, अमृत का भक्ति रस से परामर्श लेना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)