श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.17.93 
आसि’ प्रभु - पदे प ड़ि’ करेन रोदन ।
प्रभु उठि’ ताँरे कृपाय कैल आलिङ्गन ॥93॥
 
 
अनुवाद
जब चन्द्रशेखर वहाँ आए, तो वे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में गिरकर रोने लगे। भगवान ने खड़े होकर अपनी अहैतुकी कृपा से उन्हें गले लगा लिया।
 
Chandrashekhar came there and fell at the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu and started crying. Mahaprabhu stood up and embraced him out of his causeless mercy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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