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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.17.86 
प्रभु लञा गेला विश्वेश्वर - दरशने ।
तबे आसि’ देखे बिन्दु - माधव - चरणे ॥86॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद तपन मिश्र श्री चैतन्य महाप्रभु को विश्वेश्वर मंदिर ले गए। वहाँ से लौटकर उन्होंने भगवान बिंदु माधव के चरणकमलों के दर्शन किए।
 
Then Tapan Mishra took Sri Chaitanya Mahaprabhu to the Vishveshvara Temple. Returning from there, they both saw the lotus feet of Bindu Madhava.
तात्पर्य

बिंदु माधव मन्दिर वाराणसी का सबसे पुराना विष्णु मन्दिर है। वर्तमान में यह मन्दिर वेणी माधव के नाम से जाना जाता है, और यह गंगा नदी के किनारे स्थित है। पूर्व में वहाँ पाँच नदियाँ मिलती थीं, जिनके नाम धुतपापा, किरणा, सरस्वती, गंगा और यमुना हैं। अब केवल गंगा नदी ही दिखाई देती है। बिन्दु माधव का पुराना मन्दिर, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु गये थे, को बाद में मुगल वंश के हिन्दू विरोधी महान सम्राट औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। इस मन्दिर की जगह पर उन्होंने एक बड़ी मस्जिद बनाई। बाद में, मस्जिद के किनारे एक और मन्दिर बनाया गया, और यह मन्दिर आज भी मौजूद है। बिन्दु माधव के मन्दिर में चार हाथ वाले नारायण और देवी लक्ष्मी की मूर्तियाँ हैं। इन मूर्तियों के सामने श्री गरुड़ का एक स्तम्भ है, और किनारे पर भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और श्री हनुमानजी की मूर्तियाँ हैं।

महाराष्ट्र प्रांत में सातारा नामक एक राज्य है। भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के समय में, वहाँ के देशी राजकुमार वैष्णव संप्रदाय के थे। एक ब्राह्मण होने के नाते, उन्होंने देवता की पूजा का कार्यभार संभाला। उन्हें श्रीमंत बालासाहेब पंथ महाराज के नाम से जाना जाता था। राज्य अभी भी मन्दिर के रखरखाव का खर्च उठाता है। दो सौ साल पहले मन्दिर में पूजा करने का कार्यभार संभालने वाले इस वंश के पहले राजा महाराजा जगत्जीवन राव साहेब थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)