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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  2.17.82 
एइ - मत नाना - सुखे प्रभु आइला ‘काशी’ ।
मध्याह्न - स्नान कैल मणिकर्णिकाय आसि’ ॥82॥
 
 
अनुवाद
अंत में भगवान प्रसन्नतापूर्वक काशी नामक पवित्र स्थान पर पहुँचे और वहाँ मणिकर्णिका नामक स्नानघाट पर स्नान किया।
 
Finally, with a happy heart, Mahaprabhu arrived at the holy place of Kashi. There, he bathed at the ghat called Manikarnika.
तात्पर्य
हिंदी-काशी वाराणसी (बनारस) का दूसरा नाम है। यह सदियों से तीर्थ स्थल रहा है। असी और वरुणा नामक दो नदियाँ वहां मिलती हैं। मणिकर्णिका इस लिए प्रसिद्ध है कि महापुरुषों की राय में- भगवान विष्णु के कान से मणि वाला एक आभूषण वहां गिरा था। कुछ के अनुसार यह भगवान शिव के कान से गिरा। मणि शब्द का मतलब है 'आभूषण' और कर्णिका का अर्थ है 'कान से'। कुछ के अनुसार, भगवान विश्वनाथ एक महान चिकित्सक है जो पवित्र नाम के भगवान राम के कंपन को प्राप्त करने वाले कान के माध्यम से किसी व्यक्ति को मुक्ति दिलाकर भौतिक अस्तित्व के रोग को ठीक करता है। इस कारण वजह से, इस पवित्र स्थान को मणिकर्णिका कहा जाता है। कहा जाता है कि गंगा नदी जहां बहती है, उससे बेहतर कोई जगह नहीं है, और मणिकर्णिका के नाम से जाना जाने वाला स्नान घाट विशेष रूप से पवित्र है क्योंकि यह भगवान विश्वनाथ को बहुत प्रिय है। काशी-खंड में कहा गया है:

संसारि-चिन्तामणि रत यस्मात

तारकं सज्जन-कर्णिकायाम्

शिवोऽभिधत्ते सह-सान्ताकाले

तदगीयतेऽसौ मणि-कर्णिकेति

मुक्ति-लक्ष्मी महा-पीठ-मणिस तच्चरणाब्जयो:

कर्णिकेयं ततो प्राचुर्यम् यां जना मणि-कर्णिकाम

काशी-खंड के इस मार्ग के अनुसार, जो व्यक्ति मणिकर्णिका में अपना शरीर त्यागता है वह केवल भगवान शिव के नाम का स्मरण करके मुक्त हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)