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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  2.17.48-49 
केह यदि ताँर मुखे शुने कृष्ण - नाम ।
ताँर मुखे आन शुने ताँर मुखे आन ॥48॥
सबे ‘कृष्ण’ ‘हरि’ बलि’ नाचे, कान्दे, हासे ।
परम्पराय ‘वैष्णव’ हुइल सर्व देशे ॥49॥
 
 
अनुवाद
जब किसी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख से पवित्र नाम का जाप सुना, और किसी ने दूसरे व्यक्ति से, और किसी ने तीसरे व्यक्ति से, तो सभी देशों में सभी लोग ऐसी गुरु परम्परा के माध्यम से वैष्णव बन गए। इस प्रकार सभी ने कृष्ण और हरि के पवित्र नाम का जाप किया, और वे नाचते, रोते और मुस्कुराते रहे।
 
If someone heard the chanting of the holy name from the mouth of Sri Chaitanya Mahaprabhu, and then heard it from another person, and then from a third person, and so on, and so on, and so on, and so on, and so on, and so on, and so on, and so on, and so on, and so on, and so forth, and so many others ...
तात्पर्य
हरे कृष्ण महामंत्र की अलौकिक शक्ति यहाँ समझाई गई है। पहले पवित्र नाम का उच्चारण श्री चैतन्य महाप्रभु करते हैं। जब कोई उनसे सीधे सुनता है, तो वह शुद्ध होता है। जब कोई अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति से सुनता है, तो वह भी शुद्ध होता है। इस प्रकार शुद्धि प्रक्रिया शुद्ध भक्तों के बीच आगे बढ़ती है। श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की सर्वोच्च विभूति हैं, और कोई भी उनकी शक्ति का दावा नहीं कर सकता। फिर भी, यदि कोई शुद्ध भक्त है, तो सैकड़ों और हज़ारों लोग उनके उच्चारण से शुद्ध हो सकते हैं। यह शक्ति हर जीव में है, बशर्ते वह हरे कृष्ण महामंत्र का बिना किसी अपराध और भौतिक उद्देश्यों के बिना जप करे। जब कोई शुद्ध भक्त बिना किसी अपराध के जप करेगा, तो दूसरा व्यक्ति वैष्णव बनेगा, और उससे दूसरा वैष्णव निकलेगा। यही परंपरा प्रणाली है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)