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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.17.45 
‘हरि - बोल’ बलि’ प्रभु करे उच्च - ध्वनि ।
वृक्ष - लता - प्रफुल्लित, सेइ ध्वनि शुनि, ॥45॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान ने ऊंचे स्वर में “हरिबोल!” का जाप किया तो वृक्ष और लताएं उन्हें सुनकर प्रसन्न हो गए।
 
When Mahaprabhu would loudly pronounce “Haribol”, all the trees and creepers would become delighted on hearing his sound.
तात्पर्य
हरे कृष्ण मंत्र का उच्च स्वर में उच्चारण इतना शक्तिशाली है कि यह पेड़ों और लताओं के कानों तक भी पहुँच सकता है, जानवरों और मनुष्यों की तो बात ही छोड़िए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक बार हरिदास ठाकुर से पूछा कि कैसे पेड़ और पौधे मुक्त हो सकते हैं, और हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया कि हरे कृष्ण महा-मंत्र का जोर से उच्चारण न केवल पेड़ों और पौधों को लाभ पहुंचाएगा बल्कि कीटों और अन्य सभी जीवित प्राणियों को भी। इसलिए हरे कृष्ण के जोर से उच्चारण से परेशान नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह न केवल जप करने वाले के लिए बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए लाभकारी है जिसे सुनने का मौका मिलता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)