श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.17.39 
यत्र नैसर्ग - दुर्वैराः सहासन्नृ - मृगादयः ।
मित्राणीवाजितावास - द्रुत - रुट्तर्षणादिकम् ॥39॥
 
 
अनुवाद
"वृन्दावन भगवान का दिव्य धाम है। वहाँ न भूख है, न क्रोध, न प्यास। यद्यपि स्वभावतः शत्रुतापूर्ण, फिर भी मनुष्य और हिंसक पशु वहाँ दिव्य मित्रता से रहते हैं।"
 
"Vrindavan is the divine abode of the Lord. There is no hunger, no anger, no thirst. Although there is a natural hostility between humans and predatory animals, they live there in a divinely harmonious harmony."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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