विद्या-विनय-संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि
शुनी चैव श्व-पाके च पंडिताः सम-दर्शिनः
"विद्वान, विनम्र ऋषि, सच्चे ज्ञान के आधार पर, एक विद्वान और विनम्र ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते खाने वाले (अछूत) को समान भाव से देखते हैं।"
एक महा-भागवत, जो विद्वान है और आध्यात्मिक चेतना में उन्नत है, एक बाघ, एक हाथी और एक विद्वान विद्वान के बीच कोई भेद नहीं देखता है। उन्नत आध्यात्मिक चेतना की परीक्षा यह है कि व्यक्ति निडर हो जाता है। वह किसी से ईर्ष्या नहीं करता और वह हमेशा भगवान की सेवा में लगा रहता है। वह हर जीवित प्राणी को भगवान के एक शाश्वत अंग के रूप में देखता है, जो सर्वोच्च भगवान की इच्छा से अपनी क्षमता के अनुसार सेवा प्रदान करता है। जैसा कि कृष्ण भगवद्-गीता (15.15) में पुष्टि करते हैं:
सर्वस्य चाऽऽहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च
"मैं सबके हृदय में विराजमान हूँ, और मुझसे स्मरण, ज्ञान और विस्मरण की प्राप्ति होती है।"
महा-भागवत जानता है कि कृष्ण सबके हृदय में हैं। कृष्ण आदेश दे रहे हैं, और जीवित प्राणी उनके निर्देशों का पालन कर रहे हैं। कृष्ण बाघ, हाथी और सूअर के हृदय में हैं। इसलिए कृष्ण उन्हें बताते हैं, "यहाँ एक महा-भागवत है। कृपया उसे परेशान मत करो।" तो फिर, जानवरों को ऐसे महान व्यक्तित्व से जलन क्यों होनी चाहिए? जो निओफाइट्स हैं या भक्ति सेवा में थोड़े प्रगतिशील भी हैं, उन्हें महा-भागवत की नकल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बल्कि, उन्हें केवल उसके पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहिए। अनुकर शब्द का अर्थ है "नकल करना", और अनुसर का अर्थ है "पदचिन्हों का अनुसरण करने की कोशिश करना"। हमें महा-भागवत या श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यों की नकल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हमारी सबसे अच्छी कोशिशें उन्हें हमारी क्षमता के अनुसार अनुसरण करने की कोशिश में लगनी चाहिए। महा-भागवत का हृदय भौतिक संदूषण से पूरी तरह मुक्त होता है और वह बाघों और हाथियों जैसे भयंकर जानवरों के लिए भी बहुत प्रिय हो सकता है। वास्तव में, महा-भागवत उन्हें अपने बहुत ही घनिष्ठ मित्र के रूप में मानता है। इस प्लेटफॉर्म पर ईर्ष्या का कोई सवाल ही नहीं है। जब भगवान जंगल से गुजर रहे थे, तो वह आनंद में थे, जंगल को वृंदावन समझ रहे थे। वह बस कृष्ण को ढूंढ रहे थे।
