श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  2.17.205 
अश्रु - कम्प - पुलक - प्रेमे शरीर अस्थिरे ।
‘कृष्ण’ बल, ‘कृष्ण’ बल - बले उच्चैःस्वरे ॥205॥
 
 
अनुवाद
भगवान का शरीर बेचैन था, आँसू, कंपन और उल्लास प्रकट हो रहे थे। उन्होंने बहुत ऊँची आवाज़ में कहा, "कृष्ण का जप करो!" कृष्ण का जप करो!"
 
Mahaprabhu's body was restless, and tears, sorrow, and joy were evident within him. He was loudly chanting, "Say Krishna!" "Say Krishna!"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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