श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 200
 
 
श्लोक  2.17.200 
प्रभु देखि’ वृन्दावनेर वृक्ष - लता - गणे ।
अङ्कर पुलक, मधु - अश्रु वरिषणे ॥200॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर वृन्दावन के वृक्ष और लताएँ हर्षित हो उठे। उनकी टहनियाँ उठ खड़ी हुईं और वे मधुरूपी आनंद के आँसू बहाने लगीं।
 
Seeing Sri Chaitanya Mahaprabhu, all the trees and creepers of Vrindavan became happy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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