महात्मानस्तु मामं पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः
भजन्त्यनन्यमनासो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्
"हे पृथा के पुत्र, भ्रमित नहीं होने वाले, महात्मागण, दैवी प्रकृति के संरक्षण में हैं। वो पूर्ण रूप से भक्ति सेवा में लीन हैं, क्योंकि वो मुझे परम ईश्वर के रूप में, मूल और अविनाशी रूप में, जानते हैं।"
भौतिक जगत में, महात्मा शब्द को भिन्न-भिन्न धर्मों द्वारा भिन्न-भिन्न तरीकों से समझा जाता है। सांसारिक लोग भी अपनी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इंद्रिय तृप्ति में व्यस्त संकुचित आत्मा के लिए, महाजन को इंद्रिय तृप्ति की मात्रा के आधार पर पहचाना जाता है। उदाहरण के लिए, एक व्यवसायी किसी बैंकर को महाजन मान सकता है, और भौतिक भोग चाहने वाले कर्मवादी जैमिनि जैसे दार्शनिकों को महाजन मान सकते हैं। अनेक योगी हैं जो इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं, और उनके लिए पतंजलि ऋषि महाजन हैं। ज्ञानियों के लिए, नास्तिक कपिल, वशिष्ठ, दुर्वासा, दत्तात्रेय और अन्य निराकारवादी दार्शनिक महाजन हैं। असुरों के लिए, हिरण्यक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण, रावण का पुत्र मेघनाद, जरासंध और अन्य को महाजन के रूप में स्वीकार किया जाता है। शरीर के विकास पर अनुमान लगाने वाले भौतिकवादी मानव विज्ञानियों के लिए, डार्विन जैसा व्यक्ति महाजन है। कृष्ण की बाहरी ऊर्जा से भ्रमित होने वाले वैज्ञानिकों का परम ईश्वर के साथ कोई संबंध नहीं होता, फिर भी कुछ उन्हें महाजन के रूप में स्वीकार करते हैं। इसी तरह, दार्शनिक, इतिहासकार, साहित्यकार, सार्वजनिक वक्ता, और सामाजिक और राजनीतिक नेताओं को भी कभी-कभी महाजन के रूप में स्वीकार किया जाता है। ऐसे महाजनों को कुछ लोगों द्वारा सम्मानित किया जाता है, जिन्हें श्रीमद-भागवतम् (2.3.19) में इस प्रकार वर्णित किया गया है:
श्व-विड-वराहोष्ट्र-खरैः
संस्तुतः पुरुषः पशुः
न यत्-कर्ण-पथोपेतः
जातु नाम गदा-ग्रजः
"कुत्तों, सूअरों, ऊँटों और गधों के समान लोग उन लोगों की प्रशंसा करते हैं जो कभी भी भगवान श्री कृष्ण के महापापों से मुक्ति दिलाने वाले अलौकिक लीलाओं को नहीं सुनते हैं।"
इस प्रकार भौतिक धरातल पर पशुवत नेताओं की पूजा जानवर करते हैं। कभी-कभी डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता शारीरिक दर्द, संकट और भय को कम करने का प्रयास करते हैं, लेकिन उन्हें आध्यात्मिक पहचान का कोई ज्ञान नहीं होता और वो ईश्वर के साथ संबंध से रहित होते हैं। फिर भी उन्हें भ्रमित लोगों द्वारा महाजन माना जाता है। स्वयं को धोखा देने वाले लोग कभी-कभी ऐसे नेताओं या आध्यात्मिक गुरुओं को स्वीकार करते हैं जो भौतिक जीवन के नियमों द्वारा आधिकारिक रूप से नियुक्त किए गए हैं। इस तरह, वो आधिकारिक पुजारियों द्वारा धोखा दिए जाते हैं। कभी-कभी लोग महाजन के रूप में उन्हें स्वीकार करते हैं जिन्हें श्रीला वृंदावन दास ठाकुर ने ढंग-विप्र (ढोंगी ब्राह्मण) के रूप में नामित किया है। ऐसे ढोंगी श्रीला हरिदास ठाकुर के गुणों की नकल करते हैं, और वो हरिदास ठाकुर से ईर्ष्या करते हैं, जो निश्चित रूप से महाजन थे। वो महान आडंबरपूर्ण प्रयास करते हैं, खुद को भगवान के महान भक्त या जादू टोना, सम्मोहन और चमत्कार के ज्ञाता रहस्यवादी सम्मोहनकर्ता के रूप में विज्ञापित करते हैं। कभी-कभी लोग महाजन के रूप में पुतना, त्रिनवर्त, वत्स, बका, अघासुर, धनुक, कालिया और प्रलम्ब जैसे असुरों को स्वीकार करते हैं। कुछ लोग परम ईश्वर के नकलची और विरोधियों को स्वीकार करते हैं, जैसे कि पाउंड्रक, श्रृगाल वासुदेव, असुरों के आध्यात्मिक गुरु (शुक्राचार्य), या चार्वाक, राजा वेन, सुगत और अर्हत जैसे नास्तिक। जो लोग ऐसे नकलचियों को महाजन स्वीकार करते हैं, उनकी श्री चैतन्य महाप्रभु में परम ईश्वर के रूप में कोई आस्था नहीं होती। इसके बजाय, वो नास्तिक धोखेबाजों को स्वीकार करते हैं जो खुद को भगवान के अवतार के रूप में प्रस्तुत करते हैं और भौतिक दुनिया में मूर्ख लोगों को शब्दबाजी से धोखा देते हैं। इस प्रकार कई दुष्टों को महाजन के रूप में स्वीकार किया जाता है।
अधार्मिक लोग कई बार भौतिक प्रेरणाओं वाले व्यक्तियों को महाजनों के रूप में मान लेते हैं। एकमात्र प्रेरणा कृष्ण-भक्ति यानि भगवान की भक्ति होनी चाहिए। कभी-कभार लौकिक कार्यकर्ता, दार्शनिक, अधर्म के लोग, योगी और वस्तुगत समृद्धि, महिलाओं और धन से लिपटे हुए लोगों को महाजन माना जाता है। लेकिन श्रीमद् भागवत (6.3.25) ऐसे अनधिकृत महाजनों के बारे में निम्न कथन देता है:
प्रायेण वेद तद इदं न महाजनोयम
देव्या विमोहत मतित्र बाता मायालं
त्रयाम जड़ीकत मतित्र मधु पुष्पितायाम
वैतानिके महति कमणि युज्यमानः
इस भौतिक दुनिया में, कर्मियों (लाभकारी कारक) को उन मूर्ख लोगों द्वारा महाजन के रूप में स्वीकार किया जाता है जो धार्मिक सेवा के मूल्य को नहीं जानते हैं। ऐसी भौतिक बुद्धि और मानसिक सैद्धांतिक विधियाँ ऐसी मूर्ख लोगों के भौतिक प्रकृति के तीनों प्रकारों के नियंत्रण में हैं। परिणामस्वरूप वे एकनिष्ठ धार्मिक सेवा को समझ नहीं सकते। वे भौतिक गतिविधियों से आकर्षित होते हैं और भौतिक प्रकृति के उपासक बन जाते हैं। इस तरह वे लाभकारी कारक के रूप में जाने जाते हैं। वे तो भौतिक गतिविधियों में उलझकर आध्यात्मिक गतिविधियों का वेश भी धारण कर लेते हैं। भगवद गीता में ऐसे लोगों को वेद-वाद-रत, वेदों के पक्के अनुयायी के रूप में वर्णित किया गया है। वे वेदों के मूल अर्थ को नहीं समझते और फिर भी खुद को वैदिक अधिकारियों के रूप में मानते हैं। वैदिक ज्ञान में पारंगत लोगों को कृष्ण को भगवान के सुप्रीम पर्सनालिटी के रूप में जानना चाहिए। वेदैश्च सर्वैर हमा एवे वेद्यः।
इस भौतिक दुनिया में एक व्यक्ति एक कर्म-वीर, एक सफल लाभकारी कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हो सकता है या वह धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने में बहुत सफल हो सकता है या उसे मानसिक सैद्धांतिक (ज्ञान-वीर) के रूप में जाना जाता हो सकता है या वह बहुत विख्यात त्यागी हो सकता है। किसी भी स्थिति में, श्रीमद् भागवत (3.23.56) इस मामले पर निम्न मत रखता है।
नेह यत कर्म धर्माय न विराग्य कालपते
न तीर्थ पद सेवाय जीवन्न अपि मृतों हि सह
"जिसका काम धार्मिक जीवन में उन्नति करने के लिए नहीं है, जिसका धार्मिक कर्मकांड संबंधी कार्यक्रम उसे त्याग के लिए नहीं बढ़ाते और जो त्याग की स्थिति में रहता है किन्तु वह उसे भगवान के सुप्रीम पर्सनालिटी के प्रति भक्ति सेवा की तरफ नहीं ले जाता, उसे मृत माना जाना चाहिए हालाँकि वह साँस ले रहा हो।"
निष्कर्ष है कि सभी पवित्र कार्य, सांसारिक कार्य, धार्मिक सिद्धांत और त्याग अंततः धार्मिक सेवा की तरफ ले जाना चाहिए। सेवा करने के कई प्रकार की प्रक्रियाएँ हैं। कोई अपने देश, लोगों और समाज, वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली, रोगियों, गरीबों, अमीरों, महिलाओं, देवताओं और इसके आगे की सेवा कर सकता है। ये सभी सेवाएँ इंद्रियतृप्ति या भौतिक दुनिया का आनंद के अंतर्गत आती हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग कमोबेश ऐसी भौतिक गतिविधियों से आकर्षित होते हैं और इस तरह के महान नेताओं को महाजन, महान आदर्श नेता के रूप में स्वीकार किया जाता है। वास्तव में वे केवल भ्रामक नेता हैं, लेकिन एक साधारण व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि उसे कैसे भ्रमित किया जा रहा है।
नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तेते करिया ऐक्या: "व्यक्ति को साधुओं, शास्त्रों और गुरु के वचनों को अपने मार्गदर्शन के रूप में स्वीकार करना चाहिए।" साधु श्री चैतन्य महाप्रभु जैसे महान व्यक्तित्व हैं, शास्त्र प्रकट शास्त्रों के निषेध हैं, और गुरु या अध्यात्मिक गुरु वह है जो शास्त्रीय निषेधों की पुष्टि करता है। इन तीनों के मार्गदर्शन को स्वीकार करना वास्तविक उन्नति के लिए महान व्यक्तियों (महाजनों) के अनुसरण का वास्तविक तरीका है (महाजनो येन गतः स पंथाः)। भ्रम से आच्छादित व्यक्ति उचित मार्ग को समझ नहीं सकता है; इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, धर्म-स्थापना-हेतु साधुरा व्यवहार: "एक भक्त का व्यवहार अन्य सभी व्यवहारों के लिए मानदंड है।" स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति सिद्धांतों का पालन किया और दूसरों को उनका पालन करने की शिक्षा दी। पुरी-गोसाईंरा ये आचरण, सेइ धर्म सार। श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से माधवेंद्र पूरी के व्यवहार का पालन किया और दूसरों को उनके सिद्धांतों का पालन करने की सलाह दी। दुर्भाग्य से, समय-समय पर लोग भौतिक शरीर की ओर आकर्षित होते रहे हैं।
यस्यात्म-बुद्धि: कुणपे त्रि-धातुके
स्व-धी: कलत्रा दिषु भौम इज्य-धी:
यत-तीर्थ-बुद्धि: सलिला न करिचिज
जनेष्वभिज्ञेशु स एव गो-खर:
"एक इंसान जो तीन तत्वों से बने इस शरीर को अपने आप से पहचानता है, जो शरीर के उप-उत्पादों को अपने परिजनों के रूप में मानता है, जो अपनी जन्मभूमि को पूजनीय मानता है, और जो तीर्थ स्थान पर केवल स्नान करने के लिए जाता है न कि वहां पारलौकिक ज्ञान के लोगों से मिलने के लिए, उसे गधे या गाय के समान माना जाना चाहिए।" (भाग। 10.84.13) जो लोग गड्डालिका-प्रवाह के तर्क को स्वीकार करते हैं और छद्म महाजनों के कदमों पर चलते हैं, वे माया की लहरों से बह जाते हैं। इसलिए भक्तिविनोद ठाकुर चेतावनी देते हैं:
मिछे मायारा वसे, याच्छा भेसे',
खाच्छा हाबुडुबु, भाई
जीवा कृष्ण-दास, ए विश्वास,
करले त' आरा दु:ख नाई
"माया की लहरों से बह मत जाओ। बस कृष्ण के चरण कमलों में समर्पण कर दो, और सभी दुख दूर हो जाएंगे।" जो लोग सामाजिक रीति-रिवाजों और व्यवहार का पालन करते हैं, वे महाजनों द्वारा बताए गए पथ का अनुसरण करना भूल जाते हैं; इस प्रकार वे महाजनों के चरणों में अपराधी हैं। कभी-कभी वे ऐसे महाजनों को बहुत रूढ़िवादी मानते हैं, या वे अपने स्वयं के महाजन बनाते हैं। इस तरह वे परंपरा प्रणाली के सिद्धांतों की उपेक्षा करते हैं। यह सबके लिए एक बड़ा दुर्भाग्य है। यदि कोई वास्तविक महाजनों के पदचिन्हों पर नहीं चलता है, तो खुशी की उसकी योजनाएँ विफल हो जाएँगी। मध्य-लीला (अध्याय पच्चीस, छंद 55, 56 और 58) में बाद में इसे विस्तार से समझाया गया है। वहां कहा गया है:
परम कारण ईश्वरे केहा नाही माने
स्व-स्व-मत स्थापे पर-मतेरा खंडने
ताते छया दर्शन हाइटे 'तत्व' नाही जाणि
'महाजन' येई कह, सेई 'सत्य' माणि
श्री-कृष्ण-चैतन्य-वाणी — अमृतरा धारा
तिन्हो ये कहये वस्तु, सेई 'तत्व' — सारा
लोग इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि वे भगवान के निर्देशों को स्वीकार नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे तथाकथित महाजनों या अधिकारियों द्वारा समर्थित होना चाहते हैं। ताते छया दर्शन हाइटे 'तत्व' नाही जाणि: हम केवल सट्टेबाजों का अनुसरण करके वास्तविक सत्य का पता नहीं लगा सकते हैं। हमें शिष्य उत्तराधिकार में महाजनों के पदचिन्हों का अनुसरण करना होगा। तभी हमारा प्रयास सफल होगा। श्री-कृष्ण-चैतन्य-वाणी — अमृतरा धारा: "श्री चैतन्य महाप्रभु ने जो कुछ भी कहा है वह अमृत का एक सतत प्रवाह है।" जो कोई भी उनके शब्दों को वास्तविकता के रूप में स्वीकार करता है, वह परम सत्य के सार को समझ सकता है।
सांख्य दर्शन या पतंजलि के योग तंत्र का अनुसरण करने से कोई भी परम सत्य को नहीं समझ सकता, क्योंकि न तो सांख्य के अनुयायी और न ही योगी जो पतंजलि का अनुसरण करते हैं, भगवान विष्णु को परमेश्वर व्यक्तित्व (ना ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुम्) के रूप में स्वीकार करते हैं। ऐसे लोगों की महत्वाकांक्षा कभी भी पूरी नहीं होती; इसलिए वे बाहरी ऊर्जा की ओर आकर्षित होते हैं। हालाँकि मानसिक विचारकों को पूरी दुनिया में महान अधिकारियों के रूप में प्रसिद्ध किया जा सकता है, लेकिन वास्तव में वे नहीं हैं। ऐसे नेता स्वयं रूढ़िवादी होते हैं और बिल्कुल भी उदार नहीं होते। हालाँकि, यदि हम इस दर्शन का प्रचार करते हैं, तो लोग वैष्णवों को बहुत सांप्रदायिक मानेंगे। श्रील माधवेंद्र पुरी एक वास्तविक महाजन थे, लेकिन गुमराह लोग असली और नकली में अंतर नहीं कर पाते हैं। लेकिन एक व्यक्ति जो कृष्ण चेतना के लिए जाग गया है, वह भगवान और उनके शुद्ध भक्तों द्वारा बताए गए वास्तविक धार्मिक मार्ग को समझ सकता है। श्री माधवेंद्र पुरी एक वास्तविक महाजन थे क्योंकि उन्होंने परम सत्य को ठीक से समझा और अपने पूरे जीवन में एक शुद्ध भक्त की तरह व्यवहार किया। श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री माधवेंद्र पुरी की विधि को मंजूरी दी। इसलिए, हालांकि भौतिक दृष्टिकोण से सनोदिया ब्राह्मण निचले स्तर पर था, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसे आध्यात्मिक साक्षात्कार के उच्चतम स्तर पर स्थित माना।
श्रीमद-भागवतम (6.3.20) में कहा गया है कि बारह महाजन हैं: ब्रह्मा, नारद, शंभु, चार कुमार, कपिल, मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, शुकदेव और यमराज।
गौड़ीय-सम्प्रदाय में हमारे महाजनों का चयन करने के लिए, हमें श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके प्रतिनिधियों के नक्शेकदम पर चलना होगा। उनका अगला प्रतिनिधि श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी है, और अगले प्रतिनिधि छह गोस्वामी हैं - श्री रूप, श्री सनातन, भट्ट राघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट और दास राघुनाथ। विष्णु स्वामी के एक अनुयायी श्रीधर स्वामी थे, श्रीमद-भागवतम के सबसे प्रसिद्ध टीकाकार। वह एक महाजन भी थे। इसी तरह, चंडीदास, विद्यापति और जयदेव सभी महाजन थे। जो कोई सिर्फ एक नकली आध्यात्मिक गुरु बनने के लिए महाजनों की नकल करने की कोशिश करता है, वह निश्चित रूप से महाजनों के नक्शेकदम पर चलने से बहुत दूर है। कभी-कभी लोग वास्तव में समझ नहीं पाते कि एक महाजन अन्य महाजनों का अनुसरण कैसे करते हैं। इस तरह लोग अपराध करते हैं और भक्ति सेवा से गिर जाते हैं।
